Thursday, May 18, 2017

ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 : उसके इंतज़ार में उर्फ आखिर तक सुर बदल गया

ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 अभी समाप्त होकर चुका है। उत्सव की समीक्षा लिखी जानी है। हर इवेंट की समीक्षा लिखे जाने से पहले मेरे सामने यही बुनियादी सवाल होता है कि समीक्षा क्यो लिखी जाए। समीक्षा यदि जवाब है तो फिर वह सवाल क्या है? मैं सवाल की तलाश में लग जाता हूँ। जवाब तो सामने है, सवाल तक पहुँच की कोशिश ही मेरे लिए समीक्षा है।  इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव में तीन दिनों में (12-14 मई 2017) चार रंग प्रस्तुतियाँ हुईं
·        मैरिज प्रपोज़ल
·        आधी रात के बाद
·        मरणोपरांत
·        उसके इंतज़ार में
पहले दिन की समीक्षा पूर्व में आ चुकी है उसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है।
नाटक “आधी रात के बाद” शंकर शेष का लिखा हुआ नाटक है, जिसे जयपुर के युवा रंगकर्मी शिव सिंह पलवात ने निर्देशित किया। इस नाटक में दो मुख्य पात्र है एक चोर और जज। चोर चोरी से इतर उद्देश्य के तहत एक जज के घर रात को घुसता है और जज से कहता है कि वे पुलिस को फोन करे ताकि वह जेल जा सके। यह नाटक सहज ही समय की उस विडम्बना को भी संप्रेषित कर जाता है कि व्यक्ति समाज से अधिक जेल में सुरक्षित है। बेहद कसे हुए कथोपकथन विधान  में यह नाटक कसावट के साथ आगे बढ़ता है शिव सिंह पलवात व योगेंद्र अगरवाल ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया। पार्श्व ध्वनियों का बहुत सुंदर प्रयोग किया। पृष्ठभूमि में घड़ी की टिकटिक समय की गतिशीलता को बखूबी प्रदर्शित कर रही थी। यदि बेचैनी तनाव के क्षणों में यह ध्वनि तीव्र होकर फिर धीरे होती तो और भी प्रभाव पैदा करती। सम्पूर्ण प्रभाव पैदा करने में यह नाटक पूर्णत: सफल रहा।
तीसरे दिन दो प्रस्तुतियाँ हुईं - सुरेन्द्र वर्मा द्वारा लिखित व अंकुश शर्मा द्वारा निर्देशित लघुनाटक “ मरणोपरांत” तथा प्रदीप कुमार द्वारा लिखित व देशराज मीना द्वारा निर्देशित नाटक “उसके इंतज़ार में”। मरणोपरांत दो पुरुषों की दास्तां है जो एक ही महिला को चाहते हैं। एक पति(अंकुश शर्मा) है तो दूसरा प्रेमी(कृश सारेश्वर) है । जैसा कि नाटक के नाम से ही स्पष्ट है कि महिला के मरणोपरांत पति को पता चलता है कि उसकी ज़िंदगी में कोई और पुरुष भी है। दोनों पुरुष मिलते हैं यद्यपि दोनों एक दूसरे को नाकाबिले बर्दाश्त हैं लेकिन वे एक ऐसे सूत्र से जुड़े हुए हैं जो अब नहीं है। आद्यंत यह नाटक दोनों पात्रों  के माध्यम से रिश्तों में आई रिक्तता को प्रदर्शित करता है। यहाँ दोनों के सवाल हैं। और सवाल के दो रेस्पोंस है एक पहला जवाब और दूसरा खामोशी। अंकुश शर्मा ने नाटक के पात्रों की ज़िंदगी की रिक्तता को पकड़ा और नाटक के संवादों के मध्य में जगह-जगह फैला दिया। इस नाटक  में सन्नाटे को रूपायित करने का बखूबी प्रयोग किया गया है। इस सन्नाटे को और गहरे रंग देने का काम किया मदन मोहन के संगीत ने। जहां वे नाटक में चंद क्षणो के लिए मंच पर सहयोगी भूमिका में दिखाई देते है वही वे ज्यादार समय बैक स्टेज में रहकर संवादों के दरम्यान पसरे सन्नाटे को अपने आलापों के माध्यम से गहरे अर्थ देते हैं।
तीसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति थी प्रदीप कुमार द्वारा लिखित व देशराज मीना द्वारा निर्देशित नाटक – “उसके इंतज़ार में”।  इस नाटक में प्रदीप कुमार ने स्वयं अभिनय भी किया। जब वे मंच पर आते हैं तो वे नाटक के संवादों के अतिरिक्त अपनी रंगकर्मियों और समसामयिक मुद्दों पर आशु टिप्पणियों से दर्शकों को अपने साथ बांध लेते हैं। ऐसा लगता है कि उनका मंच कवि नाटक में भी उनके अवैतनिक सहयोगी के रूप में आकार खड़ा हो जाता है। प्रदीप में गजब की संप्रेषणीयता है।
जहां कवि व अभिनेता के रूप में प्रदीप बेजोड़ हैं वहीं उनके नाटककार व निर्देशक से कुछ सवाल पूछा जाना जरूरी हो जाता है। ज्ञातव्य है कि “उसके इंतज़ार में” नाम से प्रदीप पहले भी एकल नाटक प्रस्तुत कर चुके हैं जिसके लिए उन्हे बहुत सराहना मिल चुकी है। इस बार इसे टीम के रूप में प्रस्तुत किया गया। नाटक दो दृश्यों में विभाजित है। वस्तत: ये दो दृश्य न होकर फॉर्म के स्तर पर दो नाटक दिखाई हैं देते हैं। जिन्हें एक नाटक में पिरोने का पूर्णतया विफल व निरर्थक प्रयास  किया गया था। दोनो के जोड़ने में इसका जोड़ ज्यादा मुखरित हो रहा है। इन दोनों नाटकों में एक ही समानता है कि दोनों का मूल कथ्य एक है।  लेकिन पूर्वार्द्ध  का काम उत्तरार्द्ध  के बिना और उत्तरार्द्ध का पूर्वार्द्ध के बिना चल सकता है। नाटक “उसका इंतज़ार... ” जब शुरू होता है तो मंच पर दो अभिनेता ऋषभ एवं हेमेन्द्र सिंह आते है और गज़ब संवाद अदायगी, गति व टाइमिंग से पूरे दृश्य में आखिर तक अपनी सशक्त उपस्थिति से दर्शकों को प्रभावित करते हैं। मंच पर अस्त अस्त व्यस्त सज्जा उनके अभिनय में सहयोग प्रदान करती है। पहले दृश्य के खत्म होने के पश्चात एक कौतूहल के साथ पूर्वानुमान था कि नाटक में आगे जाकर एक क्लाइमेक्स बनेगा और उस बिन्दु पर नाटक खत्म होगा। लेकिन दूसरे दृश्य में नाटक का सुर ही बदल जाता है। ऐसा लगता है कि मुखड़ा किसी राग में है और अंतरा दूसरे राग में । फॉर्म का घालमेल हो जाता है। पूरे मंच पर प्रदीप अतिव्यापित हो जाते हैं। पहले दृश्य के सशक्त चरित्र ओझल हो जाते हैं। या यूं कहे कि प्रदीप उन्हे सोख लेते हैं । वे पृष्ठभूमि के साय मात्र बनकर रह जाते हैं। देशराज इस नाटक के निर्देशक है। वे तार्किक रूप से इस नाटक में यह जस्टिफ़ाई नहीं कर पाते हैं कि जब उत्तरार्द्ध का दृश्य एकल है तो मंच पर उपरोक्त तीनों नाटकों के अभिनेताओं कों क्यू झोंक देते है। जबकि उनकी जरूरत नहीं थी। देशराज इस  नाट्य उत्सव के सशक्त अभिनेताओं कों मंच पर क्यूँ छितरा देते हैं। पृष्टभूमि के ये अभिनेता नाटक मे सहयोग करने की बनिस्पत नोइस ही क्रिएट कर रहे थे। उम्मीद है कि प्रदीप अपने नाटक के फॉर्म पर पुनर्विचार करेंगे। मुझे लगता है इसके पीछे प्रदीप जी के साथ एक जनरल फिनोमिना  भी है जो उनकी विवशता बन रहा है कि खुद के लिखे आलेखों पर ही काम करना। मुझे लगता है कि प्रदीप कुमार को इसे बदलना चाहिए और दूसरे लेखकों के आलेखों पर भी काम करना चाहिए।
देशराज की एक खूबी यह रही कि मंच विधान ऐसा रखा जो सभी नाटकों कों सपोर्ट करे। जाहीर है आलेखों के चयन में उनकी सूजबूझ रही होगी जो कि कबीले तारीफ है। तीसरे दिन तक देशराज मीना टिकटिया दर्शको की संख्या पहले दिन के अनुपात में बढ़ाने में कामयाब रहे। काश इसी अनुपात में टिकटिया रंगकर्मी भी बढ़ते। खैर, सभी कों बधाई जो इस आयोजन ने जुड़े, उन्हें भी जो नहीं जुड़े।

 -(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, May 13, 2017

द मैरिज प्रोपोज़ल : अरण्य में कहकहे तलाशता एक हास्य





रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित “समर थियेटर फेस्टिवल” की प्रथम प्रस्तुति के रूप में दिनांक 12 मई 2017 को एंटोन चेखव द्वारा लिखित, देशराज मीना द्वारा रूपांतरित तथा जयपुर के धीरेन्द्र पाल सिंह द्वारा निर्देशित नाटक “द मैरिज प्रोपोज़ल” का मंचन किया गया। इस नाटक में धीरेन्द्र पाल, योगेन्द्र अगरवाल व विमला डागला ने अभिनय किया। इस नाटक की समीक्षा में बहुत सारी बाते हैं जो कही जा सकती हैं किन्तु बहुत सी ऐसी बाते हैं जो इस नाटक से बाहर हैं और कही जानी चाहिए। ये नाटक से सीधे जुड़ी न होते हुए भी नाटक को प्रभावित तो करती हैं। इसलिए उन्हें समीक्षा की जद में आना चाहिए।
नाटक के विषय में एक ही बात कह कर बात खत्म की जा सकती है कि यह नाटक दरअसल अरण्य में रचा गया एक हास्य है। दरअसल नाटक  में ह्यूमर तो  है लेकिन सामने से कोई कहकहा नहीं सुनाई देता। दरअसल खाली कुर्सियों से क़हक़हों की उम्मीद बेमानी है।  इस नाटक के कलाकारों के उत्साह के ग्राफ में उतना ही अंतर था जितना कि एक हाउसफुल औडिटोरियम और खाली कुर्सियों के समक्ष आनुपातिक रूप से होता है। रंगमंच एक जीवंत माध्यम है उसे मंच और दर्शक को अलग करके देखा नहीं जा सकता। कलाकार दर्शक से त्वरित रेस्पोंस की उम्मीद करता है। जब उसे वह नहीं मिलता तो उसके घुटनो से जान निकल जाती है। फिर वह तमाम नाटक में अपने कंधों पर ही अभिनय को ढोता रहता है। दर्शकों का यह तात्कालिक रेस्पोंस नकारात्मक व सकारात्मक दोनों होता है। जब यह नकारात्मक होता है तो वह कलाकार को और दम लगानेकी चुनौती देकर प्रोत्साहित करता है। जब यह सकारात्मक होता है तो अभिनेता में पंख लगा देता है। मुश्किल तब आती है जब यह फीडबैक आता ही नहीं। लगभग यही कल की प्रस्तुति में हुआ।  
बहुत बड़ी विडम्बना है कि शहर की लगभग साढ़े तीन लाख आबादी में से मुश्किल से 50 दर्शक नहीं जुट पाए। अलवर शहर में लगभग 30 नाट्य संस्थाओं से मुट्ठी भर प्रतिनिधि भी नहीं थे। अलवर थियेटर आर्टिस्ट एसोसिएशन के नाम से व्हटस एप्प पर संचालित ग्रुप में 103 रंगकर्मी (?) नामांकित हैं उनमे से कल के नाटक में उपस्थिति दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू  पाई। यह तब है जबकि इसी वाट्स एप्प समूह में इस इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव की सूचना लगभग एक पखवाड़े से  रोज प्रसारित की जा रही है। यूं तो ग्रुप में सदस्यों की सक्रियता देखते बनती है। दिन भर मैसेज की इनबॉक्स में धारासार वर्षा होती है। अधिकारों, दायित्वों व आंदोलनों की बाते होती हैं। लेकिन जब भौतिक रूप से उपस्थिति की बात होती है तो वहाँ पर एक चुप्पी ही पहुँचती है। इस आभासी सक्रियता को पहचाना जाना चाहिए। आभासी सक्रियता किसी काम की नहीं हैं। अलवर में तीन-चार तरह के तरह के रंगकर्मी हैं।
·        पहले दर्जे में वे हैं जो लगातार नाटक कर रहे हैं।
·        दूसरे दर्जे में वे हैं जो प्रक्रिया में हैं लेकिन उनके नाटक मंच तक नहीं पहुँच रहे हैं।
·        तीसरी श्रेणी वे हैं जो सक्रिय नहीं हैं किन्तु नाटक देखने जरूर जाते हैं।
·        चौथे दर्जे में  वे हैं जो अतीत के स्मृतियों के जमाखर्च से अभी तक काम चला रहे हैं।
एक श्रेणी और है जो केवल वाट्स एप्प पर आभासी सक्रियता दर्शा रहे हैं। इस छद्म सक्रियता को पहचानना होगा।
इसी वाट्सएएप्पी सक्रियता से शहर में औडिटोरियम की मांग को लेकर आंदोलन चलाया जा रहा है। अजीब विडम्बना है कि औडिटोरियम की निशुल्क मांग को लेकर आंदोलन चलाया जाए और जब औडिटोरियम में कोई नाटक हो तो वहाँ नाटक देखने न जाया जाए। इससे यही निगमित होता है कि दरअसल रंगकर्मियों को औडिटोरियम की जरूरत ही नहीं? या फिर वे औडिटोरियम की मुफ्त में उपलब्धता के बाद ही नाटक करने या देखने जाएंगे! समूह में सभी बाते होती हैं लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि मैं नाटक देखने आ रहा हूँ या नहीं आ सकता...  नाटक के मंचन के पश्चात ग्रुप में तस्वीरें डाली गईं, अखबार की कतरन डाली गईं। 17 घंटे के बाद किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं है.... यह सायास या अनायास चुप्पी शंकित करती है कि कहीं हमारी सक्रियता आभासी तो नहीं। खैर, इस समर उत्सव में दो पहल मजबूती से हुई हैं –
·        नाटक को समय से शुरू करना
·        टिकट से नाटक दिखाना
यह नाटक समय पर शुरू कर दिया गया था। जो भी दर्शक आए उन्हे दिखाया गया। यह एक अच्छी पहल है। ये नए दर्शक निर्माण की और उठाया गया कदम है। जो दर्शक आए उनकी लिटरेसी हो गयी कि भविष्य की प्रस्तुतियों में टाइम का महत्व है।
इस बार नाटक का टिकट 50/- का रखा गया था। थियेटर एसोसिएशन के कलाकारों को 50% की छूट थी। इस छूट का लाभ नगण्य रूप से ही लिया जा सका। लेकिन प्रेक्षाग्रह में प्रविष्टि टिकट से थी यह बात महत्वपूर्ण है। शहर के रंगकर्मियों को भी अब मुफ्त की प्रवृति को बदल कर काउंटर से टिकट लेना सीखना चाहिए। पुराने व वरिष्ठ रंगकर्मियों को अब आमंत्रण पत्रों की घर पर प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हे मीडिया से सूचना पाकर प्रेक्षागृह तक पहुँचने में अपना मान समझना चाहिए। घर-घर आमंत्रण पत्र देने में रंगकर्मी का बहुत समय, ऊर्जा व संसाधन जाया हो रहे हैं यह समझना चाहिए।
बहरहाल, आज शंकर शेष द्वारा लिखित व शिव सिंह पलवात द्वारा निर्देशित नाटक “आधी रात के बाद” का मंचन है। स्थान वही है – महावर औडिटोरियम समय ठीक 7.30 पीएम।
बड़ी संख्या में पहुँच कर ग्रीष्म नाट्य उत्सव का आनंद लें।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
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