Saturday, September 26, 2015

एक अमेच्योर एक्टर की डायरी - 1 : रटें या रमें


नाटक पर काम करते हुए कई बार आप वो कर रहे होते हैं जो दरअसल नहीं करना चाहते। नवोन्मेष केवल चाहे हुए को करने से ही नहीं होता, कई बार अनचाहा भी रचनाशीलता के अवसर दे जाता है। अरे! माफ़ कीजियेगा, इस ज्ञान का साधारणीकरण करके मत देखिए। ऐसा केवल मेरे केस में होता है। इसका मतलब यह भी नहीं कि मुझे नाटक करना पसंद नहीं है। लिहाजा परंपरा निभाते हुए जो नहीं चाहता, वही कर रहा हूँ। ट्रेन में बैठकर नाटक के संवादों को रट रहा हूँ। कल रिहर्सल पर निर्देशक की सवालिया नज़रों का सामना करना होगा, " क्या बात है अभी तक ....?" साथी अभिनेता दनादन डायलॉग बोल रहे है। उनकी डायलॉग-दुनाली में और व्यवधान क्यों डालूं! इस लिए ट्रेन के डेली यात्रियों के साथ गप्पबाज़ी करने और यात्रियों के चेहरों को उजबकों की तरह पढ़ने के स्थान पर स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूँ।

अब ट्रेन की ऊपर की बर्थ पर बैठ कर परांठे की मानिंद रोल करके रखे हुए रोल के पन्ने निकाल, सीधे करके पाठ को देख रहा हूँ। शुरू से आखिर तक । एक बार, दो बार .... बार-बार... क्रम व कवायद अनंत...। बात बनती हुई लग नहीं रही...  काश मस्तिष्क भी स्कैनर की तरह काम करता और एक दो बार आँखों से गुजारने के बाद एक जेरोक्स इमेज बन जाती पूरे ए-फॉर साइज... लेकिन ऐसा होता तो कब का हो हो जाता। स्केनिंग के लिए जरुरी है एक समतल शीट हो।  रोल की तहरीर समतल तो है लेकिन तक़रीर आड़ी-तिरछी है। भावनाओं के पिरामिड हैं विचारों के गर्त हैं और जिज्ञासाओं कंदराएँ हैं।बहुत उबड़ खाबड़ है। 3डी... नहीं,... 4डी... वह भी नहीं... अनंत डाइमेंशन हैं। इसका जहनी जेरोक्स संभव नहीं। पर... याद तो करना है। खुद पर खुद का दबाव बना रहा हूँ।
यह लो घोटा लगा के सब समतल किये दे रहा हूँ। अब सब
2डी में है ...सारा का सारा सपाट!... अब इस इसकी अनुप्रस्थ काट की सीधी-सीधी सतरें बना ली हैं। उन्हें तुरपाई करके एक चिक बना रहा हूँ ताकि मानस पटल पर आच्छादित किया जा सके। जितना चाहे खोलो, जितना चाहे लपटो, जितनी चाहिए रौशनी... क्या चिक के बाद रौशनी की चाहत या रह जाती है? याद तो करना ही है हर हाल में... रट के या रम के ! यह मेरा अब खुद पे खुद का दबाव है। मैंने अपना तरीका इज़ाद किया है... आप कैसे करते हैं?


- दलीप वैरागी 
9928986983 
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। )

Friday, September 18, 2015

कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है

यह नाटक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय तबीजी, अजमेर की लड़कियों के साथ नाट्य कार्यशाला के दौरान तैयार किया गया।
-      (मंच पर टोली आकार गाना शुरू करती है। दो गायक पहले गाते हैं बाकी समूह उन पंक्तियों को दोहराता है।)
गायक     : आइए करें तमाशा जी,
आइए करें तमाशा जी।
सुनिए अपनी भाषा जी,
सुनिए अपनी भाषा जी।
ओ रे ओ मेरे देश के वासी
ओ रे ओ मेरे गाँव के वासी
गाँव के वासी, शहर के वासी
घर के वासी गली वासी
कोरस     : आइए करें तमाशा जी ....
गायक    : चाचा आओ, चाची आओ,
काका – काकी आप भी आओ
चिंटू मोनू का साथ में लाओ,
गोलु को तुम गोद खिलाओ
खाते आओ, गाते आओ  
आइए मम्मी पापा जी .....
एक          : लो भाई आगे, अब बोलो
गायक 1,2  : ( उसे आदर से दर्शकों में बैठते है। )
आओ बैठो नाटक देखो
नाक के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं
गायक           : दांत के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं जी 
गायक           : आँख के खोल के फाटक देखो
कोरस           : अरे नहीं भाई
सब             : कान के खोल के फाटक देखो
                 आइए करें तमाशा जी ....
दो               : अरे भाई क्या है आपके नाटक में?
गायक          : इस नाटक में बड़े-बड़े हैं
पेड़ों जैसे अड़े खड़े हैं
रीत रिवाज गले सड़े है 
माल दबाए चोर खड़े हैं
तीर तमंचा तान खड़े है
तीन व चार    : ( दोनों गायकों के कनपटी पर पिस्टल तानने का अभिनय)
                 ठाँय – ठाँय
गायक           : कहीं नहीं होती सुनवाई
                 कितना ही चिल्ला लो भाई
                 ऐसा क्यों होता है भाई...
(कलाकारों की मंडली भाग कर मंच पर आती है।)
गायक           : अरे भाई कौन हो? क्यों घुसे चले आ रहे हो?
अभिनेता       : हो गया आपका तमाशा... अब अपना पेटी-बाजा उठाये और प्रस्थान कीजिए
गायक           : क्यों ?
अभिनेता       : अब हमारा रोल है।
(गाते हुए निकाल जाते हैं। )
                 आइए करें तमाशा जी ...
सूत्रधार         : नमस्कार ... हमारे नाटक में एक कहानी है...
पाँच            : डायरेक्टर साब आप भूल रहे हैं
सूत्रधार         : क्या ?
पाँच            : इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ हैं।
सूत्रधार         : हाँ तो भाई ... मैं कह रहा था कि ... इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ है...
कोरस           : बहुत खूब ... एक टिकट में दो फिल्में
छ:              : डायरेक्टर साब आप फिर भूल रहे हैं
सात            : अब क्या है भाई ...
सात            : इस नाटक में दो नहीं तीन कहानियाँ है।
कोरस           : क्या बात है...
सूत्रधार         : बिलकुल इस नाटक में दो नहीं तीन-तीन कहानियाँ हैं। 
आठ             : आप बिलकुल भुलक्कड़ हैं डायरेक्टर साब... इस नाटक में चार – चार कहानियाँ                  है।
एक             : ये नाटक तो कहानियों की किताब है...
कोरस           : जिसमें कहिनियाँ बेहिसाब हैं...
                 आइए करें तमाशा जी... (गाते हुए मंच का चक्कर लगते हैं)
एक             : यह कहानी सीता की है... 
दो               : जिसके कुछ सपने हैं ।
तीन             : यह कहानी गीता की है...
चार             : जिसके सपनों पर समाज का पहरा है।
पाँच            : यह कहानी अंजली की है...
छ:              :  जिसका दुख और भी गहरा है।
सात            :  यह कहानी रीना की है...
आठ             : जो सपनों को सच करना चाहती है।
कोरस           : ये कहानी हम सब की है....
                 आइए करें तमाशा जी ...
( अस्पताल का दृश्य सीता के पिता बेड पर लेटे हैं। दृश्य में सीता के चाचा, चाची व सीता हैं। )
चाची           : (सीता को दुलारते हुए) हाय मेरी प्यारी भतीजी... माँ तो पहले ही मर गई...                  अब पिता भी बहुत बीमार हैं। तुम चिंता मत करो... तुम मेरे पास रहना ... मैं                  तुझे अपनी बेटी की तरह रखूंगी।
(चाचा बाहर आता है। )
चाचा           : बेटी तू अपने पिता के पास बैठ जरा...
चाची           : अजी क्या हुआ ?
चाचा           : ज्यादा देर नहीं अब
चाची           : इतनी देर मत करो जमीन के कागज़ का काम पहले...
चाचा           : हो गया...
(अंदर से सीता के रोने की आवाज़ आती है। सब रोते हुए सीता के पापा के चारों और घेरा बनाते है। दृश्य बदलता है। )
गायक           : सीता की अब ये कहानी हुई
                 चाचा-चाची के मन में बेईमानी हुई...
                 फंस गई देखो उनके जाल में
                 सीता कि अब ये कहानी हुई ...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा... सीन वन... टेक वन ... एक्शन
चाचा           : सीता मेरे कपड़े प्रेस हो गए?
सीता            : हाँ, ये रहे
चाचा           : ये क्या ! शर्ट जला दी...
चाची           : सीता बर्तन माँज दिए ...
सीता            : जी चाची ... ये रहे 
चाची           : ये बर्तन माँजे है? कितने गंदे हैं... (बर्तन फेंकती है। )
चाचा           : मेरे जूते पोलिश हो गए क्या
सीता            : जी, ये लो ॥
चाचा           : देखो कितने गंदे हैं ... ये पोलिश की है?
(थप्पड़ मार कर गिरा देता है।)
चाची           : इससे कुछ नहीं होता ... मैं कहती हूँ इसे घर से निकाल बाहर करो ...
(दोनों उसे खींच कर घर से बाहर निकाल देते हैं।)
सूत्रधार         : कट ... कट ...कट ... माफ कीजिएगा, हम इस कहानी को यहीं रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों ? क्यों भाई क्यों ??
सूत्रधार         : क्यों कि इससे आगे कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है...
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : सीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है।
एक             : सीता का अपहरण हो सकता है।
दो               : सीता किसी गिरोह के चंगुल में फंस सकती है।
तीन             : उससे भीख मँगवाई जा सकती है।
चार             : इसके लिए उसे अपाहिज बनाया जा सकता है।
पाँच            : उससे बाल मजदूरी कारवाई जा सकती है
छ:              : उसका बलात्कार किया जा सकता है।
सात            : उसे मारा जा सकता है।
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी सीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन टू , टेक वन ... एक्शन
(मंच के दोनों कोनों पर सामांतर दो दृश्य बनते हैं। एक में बच्चे खेल रहे हैं दूसरे में बड़े बात कर रहे हैं। )
बच्चे             : कोड़ा ए जमालशाही ... पीछे देखे मार खाई ...
बच्चा एक       : चलो गुड्डा-गुड्डी का खेल खेलते हैं।
बच्चा दो         : हाँ... हाँ... खेलते हैं ...
व्यक्ति एक      : और रामलाल जी क्या हाल है
व्यक्ति दो       : बहुत अच्छा... आप... आप कैसे हैं?
बच्चा तीन       : अरे तेरी गुड़िया तो बहुत सुंदर है...
बच्चा चार       : तेरा गुड्डा भी बहुत खूबसूरत है...
व्यक्ति एक      : तुम्हारी लड़की बहुत सुंदर है...
व्यक्ति दो       : आपका लड़का भी बहुत खूबसूरत है...
बच्चा तीन       : तुम्हारी गुड़िया क्या करती है?
बच्चा चार       : मेरी गुड़िया तो स्कूल जाती है। तुम्हारा गुड्डा क्या करता है?
बच्चा तीन       : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
व्यक्ति एक      : आपकी लड़की क्या करती है?
व्यक्ति दो       : मेरी लड़की तो स्कूल जाती है... और आपका लड़का क्या करता है?
व्यक्ति एक      : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
बच्चा तीन       : मुझे तुम्हारी गुड़िया पसंद आई
बच्चा चार       : मुझे भी आपका गुड्डा पसंद है।
व्यक्ति एक      : भाई मुझे आपकी लड़की पसंद है
व्यक्ति दो       : मुझे भी आपका लड़का पसंद है।
बच्चा तीन       : चलो गुड्डे – गुड्डी की शादी कर देते हैं
व्यक्ति एक      : भाई रिश्ता पक्का !
व्यक्ति दो       : समझो पक्का बिलकुल पक्का।
व्यक्ति तीन     : चलो मुँह मीठा करो।
(शहनाई व बाजे की आवाज के साथ कलाकार बच्चों के चारों और घूमते हैं। संगीत अब मंत्रोचार में बदल जाता है। कोरस बच्चों के चारों और घेरे में आ जाता है। )
सूत्रधार         : कट... कट... कट...  माफ कीजिएगा इस कहानी को हम यही रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों (कोरस का प्रत्येक व्यक्ति बारी-बारी से “क्यों” बोलते हुए पीछे अर्धवृत्त मे            खड़े हो जाते हैं। )
चार             :  सर, हमने मेहनत की है...
पाँच            : जम कर रिहर्सल की है...
कोरस           : आखिर क्यों रोक रहे हैं ?
सूत्रधार         : क्योंकि इससे आगे यह कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है।
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : गीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है...
एक             : उससे दहेज मांगा जा सकता है...  
दो               : दहेज के लिए पीटा जा सकता है...  
तीन             : घर से निकाला जा सकता है...
चार             : जलाया जा सकता है...
पाँच            : उसकी पढ़ाई छुड़वाई जा सकती है...
छ:              : वह कम उम्र में माँ बन सकती है...
सात            : इस वजह से उसकी मौत भी हो सकती है...
आठ             : वह बल विधवा बन सकती है...
नौ              : उसकी सारी जिंदगी तबाह हो सकती है...
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी गीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
(मंच के दोनों छोर पर बारी बारी से सीन बनेंगे पहला सीन पूरा हो जाने पर फ्रीज़ हो जाएगा, दूसरी साइड में दूसरा बनेगा। )
सूत्रधार         :  लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन थ्री, टेक वन ... एक्शन
(एक लड़की रास्ते से जा रही है। दो लड़के अपनी बाइक पर आते हैं और चारों ओर बाइक से चक्कर लगाकर उसे छेड़ते हैं। )
लड़का 1        : अरे यार क्या लड़की है।
लड़का 2        : आजा, चलती है क्या ...
लड़की          : बत्तमीज...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... लाइट... साउंड... कैमरा... सीन थ्री... टेक टू... एक्शन...
(बस आती है। कंडक्टर आवाज़ लगा रहा है। बस पर लोग चढ़ते हैं। दो लड़कियां चढ़ती है। उनके पीछे दो लड़के भी चढ़ जाते है। )
लड़का 3        : अरे देख तेरे आगे वाली को
लड़का 4        : क्या बाल हैं इसके (हाथ पकड़ता है। लड़की वहाँ से हट जाती है। )
लड़का 3        : आगे वाली को भी देख ( लड़का 4 झटके से उसके ऊपर झुकता है।)
लड़की 2        : डोंट टच मी...
लड़का 4        : कसम से पूरी अंग्रेज़ है...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... माफ करना, हम इस नाटक को...
कोरस           : हम यहीं समाप्त कर रहे हैं ...
सूत्रधार         : नहीं, हम इस नाटक को समाप्त नहीं करेंगे...
कोरस           : तो फिर कौन करेगा?
सूत्रधार         : (सामने दर्शकों से ) आप करेंगे...
सूत्रधार         : (किसी दर्शक विशेष को टार्गेट करते हुए) जी हाँ, आप करेंगे... क्यों करेंगे न...            आइए जी ... अब मंच आपके हवाले है। इस दृश्य को यही खत्म करना चाहें तो                  यहीं खत्म करें। आगे बढ़ाना चाहें तो आगे बढ़ाएँ। सुखांत बनाना चाहें सुखांत                    बनाएँ... दुखांत बनाना चाहें तो दुखांत बनाएँ... आइए .... ( इसी प्रकार दो तीन           दर्शकों को मंच पर फ्रीज़ हुए सीन को परिवर्तित करने को कहें। कोशिश यह हो कि         मुद्दे पर जम कर चर्चा भी हो सके। )


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दलीप वैरागी 
09928986983 




 
  


Saturday, September 12, 2015

नाटक को पाठशाला से प्रेक्षागृह में निर्देशक बदलता है

बच्चों के नाटक प्रायः प्रदर्शनधर्मी (परफॉर्मेंस ओरिएंटेड) नहीं होते हैं। वे अपने नाटक दर्शक को मद्देनज़र रख कर बनाते ही नहीं । बच्चों के नाटकीय खेलों पर तो यह बात सौ फीसदी फिट बैठती है। नाटकीय खेलों में तो दर्शक अयाचित होता ही है। वे अपने इन खेलों को आइसोलेशन में खेलते हैं। आइसोलेशन से अभिप्राय है कि उन्हें वयस्कों की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं होती। हो भी क्यों न, ज्यादातर उनके खेलों के किरदार यही वयस्क लोग होते हैं। और यह आप जानते हैं कि राजा नंगा है ये बात छोटे बच्चे ही बोल सकते हैं। इसलिए उनकी सेंसरशिप से मुक्त बच्चे अपनी छोटी सी दुनिया में इस विराट संसार को निर्ममता से परख रहे होते हैं। अगर आप थोड़े समय के लिए बचपन के कुछ नाटकीय खेलों को याद कर पाएं तो यक़ीनन आपको एक दो ऐसा मिल जाएगा  जो बड़ों के हिसाब से नाकाबिले बर्दाश्त होगा।
बड़ा होने पर यानि स्कूल जाने की अवस्था में दर्शक का थोडा दखल बढ़ता है। यहाँ पाठ्यचर्या के भीतर या बहार उन्हें नाटक करने के लिए कहा जाता है। बच्चे इन नाटकों को उतनी ही शिद्दत से तैयार करते हैं जितना वे उसे अपने स्वायत्त नाटकीय खेलों में करते थे। स्कूल में खेले गए नाटकों में उनका लक्ष्य दर्शक होते तो हैं लेकिन उन्हें अब भी दर्शकों की परवाह कतई नहीं होती। वे अपने प्रदर्शन में पूरा समय व ध्यान दुनिया के बारे में खुद की समझ को व्यक्त करने या फिर उसे दुरुस्त करने के उपक्रम में लगाते हैं। परफॉर्मेंस के बीच में यदि किसी पात्र की पगड़ी खुल गई तो फिर कथा उतनी देर तक स्थगित रहती है जब तक कि उसका दुरूस्तीकरण नहीं हो जाता है। हो सकता है कि विभिन्न प्रकार की पगड़ियों, पंजाबी, राजस्थानी, मराठी या फिर किसान की या नेता की पगड़ियों को बांधकर देखा जाए और इसी पर उनकी चर्चा का सिलसिला निकल पड़े और मूल कथा थोड़ी देर स्थगित हो जाए।
मुख़्तसर में यह कहा जा सकता है कि हम बच्चों के नाटकों चाहे वे किसी भी फॉर्म में हों महज दर्शक बनकर नहीं जुड़ सकते। यदि आप शिक्षक हैं , यानि सीखने व सिखाने में यक़ीन रखते हैं और बच्चे को स्वतंत्र सोच रखने वाला व्यक्ति मानते हैं, तो आप बच्चों के साथ नाटक पर काम करते वक़्त आनंद से नहा जाएंगे।
किसी भी नाटक को पाठशाला से प्रेक्षागृह में निर्देशक बदलता है। दर्शक की एंट्री निर्देशक की मार्फ़त होती है। यहीं से नाट्यकला स्कॉलस्टिक से को स्कॉलस्टिक की और चल पड़ती है। निदेशक यदि शिक्षक अभिवृत्तिशुदा है  तो यह भेद अस्वीकार भी किया जा सकता है। पाठशाला का प्रेक्षागृह में रूपांतरित होना कोई बुरी बात नहीं है। अंततः नाटक एक प्रदर्शन कला है। उसे अपने अंजाम तक जाना ही होता है। दरअसल निर्देशक दर्शक का लक्ष्य करके अभिनेता या विद्यार्थी को दूसरा सामाजिक पक्ष दिखता है। अभी तक अभिनेता अपने अंदर संसार की छवि को तलाश रहा होता है। निर्देशक दर्शक का संधान करके उसे चौखटे ( फ्रेम ) में रखता है। जो दूसरे के दृष्टिकोण को भी समझने में मदद करता है। इस प्रक्रिया से अभिनेता या विद्यार्थी सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपने अंदर सामजिक कौशल, सम्प्रेषण कौशल  व अपने सौंदर्यबोध में परिष्कार करते हैं। निदेशक मन की छवि को जन की छवि के पास रख कर अभिव्यक्ति का प्रेरण देता है। मुझे लगता है शिक्षा में नाट्यकला की सार्थकता इसी में है कि पाठशाला प्रेक्षागृह में रूपन्ततित हो और प्रेक्षागृह पाठशाला में। यह तभी हो सकता है जब यही फ्लेक्सिबिलिटी शिक्षक और निर्देशक में भी हो। 
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Thursday, September 3, 2015

लघु नाटिका - सब कुछ सड़क पर...

(इस लघु नाटिका को जयपुर शहर के मोती कटला माध्यमिक विद्यालय की लड़कियों के साथ नाट्यकार्यशाला के लिए लिखा गया था। इसका मंचन 6 जून 2015 को बिड़ला ऑडीटोरियम में किया गया।)

सूत्रधार    : नमस्कार
कोरस    : आदाब, सतश्रीअकाल
सूत्रधार   : हमारी टीम ने एक नाटक तैयार किया है।
कोरस    : कैसा नाटक, कौनसा नाटक?
सूत्रधार            : इस नाटक के माध्यम से हम...
कोरस    : सन्देश देंगे... उपदेश देंगे... बड़ी-बड़ी बाते करेंगे...
सूत्रधार            : अरे नहीं भाई
कोरस    : तो फिर क्या है आपके नाटक में?
सूत्रधार            : इस नाटक में एक कहानी है...
एक       : और वो कहानी शर्म से पानी पानी है।
दो        : पूरी स्टोरी सड़ी-गली है।
तीन      : इस नाटक में इस शहर की हर गली है।
चार      : इस नाटक में कचरे की भरमार है।
पाँच      : पूरा नाटक ही बदबूदार है।
छः, सात : अजब सा नाटक!
आठ, नौ : गजब का गजब का नाटक !!
कोरस    :  .....अजब का नाटक,
          गजब का नाटक।
          अहा जी नाटक,
          वाह जी नाटक।
          यहाँ भी नाटक,
          वहां भी नाटक।
सूत्रधार            : अरे रुकिए भाई, रुकिए... बैठिये जी बैठिये... पहले मैं इस नाटक की स्टार कास्ट से तो आपका      परिचय करवा दूँ... एक-एक करके आइए और अपना परिचय दीजिए...
मेहरबान... कदरदान... हमारे स्टार कलाकारों के लिए जोरदार ताली बजाइयेगा..नहीं तो बाद में पछताइयेगा... तालियाँ
एक      : मेरा नाम शालिनी है। मैं एक शिशिका  हूँ। मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ। और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलता हूँ।
एक      : कौन बोला?
कोरस   : (छोटे बच्चों की तरह) कोई नहीं मैडम जी।
दो       : मेरा नाम आनंद है। मैं एक इंजीनियर हूँ। मैं बड़े-बड़े पुल व बिल्डिंग्स बनाता हूँ। और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलता हूँ।
दो       : क्या?
कोरस   : जी हाँ साहब।
तीन     : मेरा नाम सुषमा है। मैं एक हाउस वाइफ हूँ। मैं घर का सारा काम करती हूँ। और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाती हूँ।
तीन     : क्या? (डाँटते हुए)
कोरस   : सॉरी मम्मी जी।
चार     : मेरा नाम राजू है। मैं एक डॉक्टर हूँ। लोगों का इलाज करता हूँ और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाता हूँ।
चार     : क्या?
कोरस   : जी हाँ जनाब
पाँच     : मेरा नाम सिमरन है। मैं एक टूरिस्ट हूँ। जगह-जगह घूमती हूँ और...
कोरस   : कचरा भी फैलाती हूँ।
छः       : मेरा नाम रामलाल है। मैं किराने का व्यापारी हूँ और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाता हूँ।
सात     : क्या कहा?
कोरस   : सही कहा
आठ     : मेरा नाम शाहरुख़ है। मैं एक विद्यार्थी हूँ। हमेशा क्लास में अव्वल आता हूँ और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाता हूँ
आठ     : क्या कहा
नौ, दस           : बिलकुल सच।
कोरस   : .......सच सच बिलकुल सच
          बात कहेंगे सारी सच
          चाहे तो लग जाए धक्
          धक् धक् धक् धक्....
(कोरस लगातार दोहराते हुए घूमता है।)
दृश्य - 1
(दो व्यक्ति कार में बैठे हैं। एक ड्राइव कर रहा है तथा दो की गोद में बच्चा है।)
एक      : सॉरी आज कंस्ट्रक्शन साइट पर देर हो गई।
दो       : इट्स ओके..... ला...लल्ल ..ला... ओह इसने तो सूसू कर दिया।
एक      : जल्दी से इसका डाइपर बदलो।
दो       : (डाइपर बदलती है।)  अरे इसका कांच तो खोलो। ( डाइपर को बहार डालने के लिए हाथ बहार  निकलती है)
कोरस   : (ज़ोर से चिल्लाकर) ये sss फैंका sss...स्कूटर वाले के मुंह पे।
बात कहेंगे सारी सच
चाहे तो लग जाए धक
दृश्य - 2
तीन     : नमस्ते गुरूजी आपका स्कूल कैसा चल रहा है?
चार     : बहुत अच्छा चल रहा है।
पाँच     : छोड़ो यार चाय पीते हैं।
तीनो    : चलो ( एक थड़ी पर बैठ कर चाय पीते हैं और चाय ख़त्म होने पर डिस्पोजल कप को एक साथ गली में डालने का अभिनय करते हैं।)
कोरस   : (जोर से चिल्लाकर) ये ssss फैंका ssss
दृश्य - 3
छः       : (झाड़ू लगा रही है।)
सात     : रज्जो sss
आठ     : माँ मैं खेलने जा रही हूँ।
सात     : इसे फैंक के आओ
आठ     : कहाँ डालना है माँ?
कोरस   : बहार गली में
आठ     : (फैंकने का अभिनय करती है)
कोरस   : ये ssss फैंका sss
बात कहेंगे सारी सच
चाहे तो लग जाए धक
दृश्य - 4
नौ       : वाओ !... वंडरफुल !!
दस      : ब्यूटीफुल सिटी
नौ       : कितनी गर्मी है यहाँ
दस      : लो पानी पियो। ( दोनों बोतलों से पानी पीते है। एक साँस में ख़त्म करते हैं और वहीं डाल देते हैं।)
कोरस   : ये sss फैंका sss
ये फैंका वो फैंका
इधर फैंका उधर फैंका
यहाँ फैंका वहाँ फैंका
(सब एक घेरे में आते है। आधा घेरा भी हो सकता है।)
कोरस   : हम सब भारतवासी हैं।
हिन्दू - मुस्लिम
सिख - ईसाई
अमीर-गरीब
शहरी-ग्रामीण
पढ़े-अनपढ़े
हम सब में गजब की एकता है -
शैम्पू का खली पाउच
डिस्पोजल कप
तेल की खाली शीशी
पानी की बोतल
घर का कचरा
बच्चे का डाइपर
गुटखे की पीक
फैंक देते है हम
सारे सड़क पर
सारे सड़क पर......
सूत्रधार : तो साहब यह नाटक यही समाप्त होता है।
एक      : रुकिए
दो       : ऐसा क्यों होताहै...
तीन     : एक तरफ हम सफाई पसंद करते हैं और...
चार     : दूसरी और हम गंदगी फैलते हैं।
कोरस   : बताओ... बताओ... बताओ...
सूत्रधार           : मुझसे नहीं, इनसे पूछो ( दर्शकों की और इशारा करते हुए।)
कोरस   : बताइये... बताइए आप बताइए ही बताइये
सूत्रधार सवालों के माध्यम से दर्शकों से इस मुद्दे पर बात करता है? कोशिश यह होनी चाहिए कि दर्शक खुल कर इस चर्चा में भाग लें
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 


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