Saturday, October 31, 2015

अभिव्यक्ति अपना व्याकरण खुद रच लेती है।

राजस्थान के पाली ज़िले के फालना में किशोरियों के आवासीय शिक्षण शिविर में अकादमिक सम्बलन हेतु आया था। चार महीने के इस शिविर में गरासिया जनजाति की पचास किशोरियाँ आवासीय रूप शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। अभी इस शिविर को शुरू हुए लगभग सप्ताह का समय हुआ था। जब मैंने शिक्षिकाओं से पूछा कि किस तरह के सपोर्ट की जरुरत है। सबने एक ही बात कही कि इन लड़कियों के साथ अभिव्यक्ति पर काम करने की जरुरत है।
मैंने लड़कियों से बातचीत शुरू की। लड़कियां मुखर नहीं थीं। वे बातचीत में नहीं जुड़ रही थीं। मैंने कुछ ऐसी गतिविधियाँ शुरू की जिससे लड़कियाँ बोलचाल में शामिल हों, सहज हों। पर इस सहजता के माने क्या हैं कई बार हमें खुद नहीं पता होते और अभिव्यक्ति के भी... लड़कियां हिंदी समझती हैं लेकिन ज्यादातर बातचीत मारवाड़ी में ही करती हैं। हिंदी वे बोलती नहीं तो फिर क्या किया जाए? सोचा जहाँ से वे मुखर हैं वहीँ से ही उन्हें सुना जाए। अभिव्यक्ति का भी एक जबरदस्त राजनैतिक रिश्ता होता है शिक्षक और विद्यार्थी के दरम्यान - जब उन्हें उनकी मातृ भाषा से अलग शिक्षक की भाषा या अन्य भाषा में सिखाया जाता है तो अनायास ही शिक्षक सत्ता के और भी ऊँचे शिखर पर जा बैठता है तथा विद्यार्थी हीनताबोध की गहरी खाई में। फलस्वरूप शिक्षक इस मुगालते को जुमले की तरह उछलता है कि विद्यार्थी अभिव्यक्ति में कमज़ोर है। यह मुगालता चेतन व अवचेतन दोनों में पलता है।
नाट्यकला ऐसी स्थिति में बहुत मदद करती है। नाट्याभिव्यक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा शारीरिक भाषा का होता है। शारीरिक अभिव्यक्ति की भाषा कमोबेश सार्वभौमिक-सी होती है। उन लड़कियों से संवाद बनने की शुरुआत हो और वे बराबरी की हैसियत में आकर, होंसले से प्रक्रिया में शामिल हों, इन लड़कियों के साथ “शूज शफल” गतिविधि करवाई। शूज शफल एक बहुप्रचलित थियेटर एक्सर्साइज़ है। इसमें कोई वस्तु मंच पर रखी जाती है जिसे अभिनेता को अपनी कला से उसे अन्य वस्तु मान कर अभिनय करना होता है।
मैंने ऑब्जेक्ट के रूप में ढपली को रखा और लड़कियों से आकर अभिनय करने के लिए कहा। सन्नाटा। एक बार को मैंने मान ही लिया था कि यह गतिविधि भी अब तक आजमाई गई गतिविधियों में एक बन कर रह गई। फिर मैंने सोचा शायद यह मेरी हिंदी की सम्प्रेषणीयता का ही नतीजा तो नहीं। तो क्या मारवाड़ी में बोला जाए? या अनुवादक की भूमिका तय की जाए। अचानक मैंने शारीरिक अभिव्यक्ति के विकल्प को बेहतर माना और गतिविधि को एक बार डेमोन्सट्रेट कर दिया। इससे जैसे ठहरे पानी में लहरें उठीं और लड़कियां बारी-बारी से उठ कर आने लगीं। फेरी वाले की टोकरी, आरती का थाल, भिखारी का कटोरा, आटे की परात, चकला, बैठने की चौकी, आइना,आटा छलनी और जाने कौन-कौनसे रूपों में ढपली ढलने लगी।
एक तरफ ढपली है, दूसरे छोर पर लड़कियाँ और उनका शारीर इन दोनों को जोड़ते हुए एक विचार प्रवाहित हो रहा है दरम्यान। और यह विचार कल्पना को जन्म दे रहा है। और वह कल्पना अवचेतन की अँधेरी गलियों में से एक चरित्र को खोज लाई और उस चरित्र का जामा ओढ़कर लड़की खड़ी होती है और एक झीना पर्दा डाल देती है दर्शक की चेतना पर। उसी विचार की सरिता में  दर्शक भी डुबकी लगता है। अभिनेता की कल्पना दर्शक की छवि से एकाकार हो जाती है। जिससे चीजें जड़ होते हुए भी अलग-अलग रूपाकारों में नमूदार होने लगती हैं। शायद इसी कवायद को हम अभिनय कह देते हैं। छोटे बच्चे इस फन के उतने ही बड़े उस्ताद होते हैं। वे अपने नाटकीय खेलों में घंटो तक लकड़ी के चौकोर टुकड़े से हाथी के संवाद बुलवा  देते हैं और कोट के पुराने बटन की कश्ती बना सागर की लहरों पर छोड़ दें। मज़ाल है कोई चीज़ उनकी हुक्मउदूली कर दे। यहाँ दर्शक और अभिनेता वही होता है।
खैर, शूज शफल की गतिविधि चल निकली। अब वे लड़कियां भी सामने आने लगीं जो अब तक अपेक्षकृत कम सक्रीय थीं। कई तो दो तीन बार भी आ गईं। गतिविधि लंबी खिंच गई। मैं इसे समाप्त करना चाहता था या कोई नया मोड़ देना चाहता था। ऊब कही से भी प्रवेश कर जाती है।
इससे पहले मैं कोई तरीका सोचूं लड़कियों ने स्वयं ही एक बदलाव कर दिया। अचानक दो लड़कियाँ एक साथ उठकर आईं और रखे हुए ऑब्जेक्ट के साथ एक्ट करने लगीं। इसके साथ एक नया आयाम जुड़ गया जो विचार की नितांत आंतरिक निःशब्द यात्रा थी अब वह दो में साझा प्रक्रिया बन गया। फलस्वरूप इस साझा तैयारी ने शब्दों का ताना बाना भी बुनना शुरू कर दिया। विचार शब्दों के समुच्चय में उतरने लगा। इधर मैंने भी एक नया आयाम जोड़ दिया और ढपली के आलावा एक झाड़ू को भी रख दिया। अब झाड़ू भी उनकी साझा अभिनय यात्रा में शामिल हो गई। मैंने एक और वस्तु को शामिल कर दिया। पास रखी ढोलक को मंच पर सरका दिया। वस्तुएं बढ़ी तो चुनौती भी। पहले विचार में दो ही सहयात्री थे अब अन्य सिर भी आपस में जुड़ने लगे। धीरे-धीरे चीजें इस्तेमाल होने लगीं, अपने से जुदा रूपों में। धीरे-धीरे एक्ट में भाग लेने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ने लगी। अपने आप जरुरत के अनुसार अन्य वस्तुएं भी जुड़ने लगीं और लोग भी। अब चौकोर (प्रोसिनीयम) रंगमंच गोल दायरे (एरिना) में बदलने लगा। गोल रूपाकार शायद लोगों के जुड़ने के लिए ही होता है। परिधि में कोई भी जुड़ जाए तो केंद्र नहीं बदलता। और चौखटे में केंद्र की कोई स्थिति कहाँ? किसी एक बाजु का घट बढ़त दूसरी तरफ का गणित गड़बड़ कर जाता है। शायद इसी लिए आदिवासी नृत्यों का फॉर्म वृत्ताकार परिधि में ही होता है। जबकि शास्त्रीय नृत्यों की कसावट एक चौखटे में कसी होती है। यहाँ आपके लिए दर्शक दीर्घा से मंच तक का फासला मीलों लंबा हो सकता है। लोक कलाओं में महज वृत्त की लकीर भर लाँघनी है।
गतिविधि में शामिल लड़कियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि दर्शक और अभिनेता के बीच की रेखा धूमिल हो गई। अब गोल दायरे के बीच में विचार और बड़ा आकार ले चुका था एक क्षीण कथासूत्र के रूप में। प्रॉप्स भी यूज हो रहे थे अलहदा रूप में और अपने वास्तविक रूप में भी। खेल के नियम पीछे छूट गए। प्रारूप की जकड़न छूट गई। खेल अब खेला बन गया। सहज अभिव्यक्ति अपनी प्रकृति में ही विद्रोही होती है शायद। वह बाँध में नहीं बाँधी जा सकती।  वह अपने व्याकरण खुद रच लेती है। हॉल में अब अभिनय था, ऊर्जा थी और थी सरापा अभिव्यक्ति और सब उसमें सराबोर। मैं(निर्देशक) वहां होते हुए भी ओझल हो चुका था शायद अप्रासंगिक भी। कुछ था तो पूरे कमरे में तैर रहा था एक नाटक। अपने आप मिटटी में ऊगा हुआ सा। पूरे कमरे में अभिनय और ऊर्जा का सागर हिलोरें ले रहा था।उसने निर्देशक को नेपथ्य पर ला पटका।
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 



दलीप वैरागी 
09928986983 

Thursday, October 22, 2015

नाट्यकला पर एक प्रश्नावली

यूं तो हिन्दी रंग मंच की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है, फिर भी इसकी वास्तविक स्थिति को जानना उन लोगों के लिए जरूरी होता है जो हिन्दी रंगकर्म को आगे ले जाने के लिए व्यवस्थित प्रयास करना चाहते हैं। यहा सवाल दर सवाल एक प्रश्नावली तैयार की है जिससे यह जानने का प्रयास किया गया है कि रंगकर्मियों, दर्शकों व अन्य जो नाट्यकला से अभी नहीं जुड़े हैं उनके मानस में नाटक को लेकर क्या छवि है। इस अध्ययन में यही जानने का प्रयास किया गया है। यह तभी हो सकता है जब ज्यादा से ज्यादा लोग इस फॉर्म को भरें। और इसे शेयर करें ताकि अधिक लोग इस अध्ययन का हिस्सा बन सकें।
इस प्रश्नावली को ऑनलाइन भरा जाना है। 
इसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। 
क्लिक करके खोलें - 

Monday, October 12, 2015

स्वरांजलि संगीत क्लब की एक सुरमयी शाम

यूँ तो हर तरह का संगीत जबरदस्त अनुशासन का उदहारण है। जब कोई गान किसी पहले से तैयार म्यूजिकल म्यूजिकल ट्रैक पर करना हो तो वह और भी ज्यादा अनुशासन की मांग करता है। साजिंदों की संगत में लाइव वाद्य यंत्रों के साथ गाना गायक को शायद थोड़ी छूट देता है। वह छूट होती है फ्रेम से थोडा बाहर जाकर कोई नवाचार करने की यहाँ गायक और संगत दोनों जीवंत माध्यम हैं, दोनों एक दूसरे का सहयोग करके आगे बढ़ते हैं। दोनों के लिए ही उत्कृष्टता का आग्रह मोटिवेशन का उत्स है। यहाँ उत्कृष्टता के मापदंड परिभाषित नहीं, दोनों ही, गायक और संगत प्रत्यक्ष प्रस्तुति के वक़्त खुद उत्कृष्टता के मापदंड रचते हैं। म्यूज़िक ट्रैक पर गायन में फ्रेम से बहार जाने की छूट नहीं है। यहाँ आपको यन्त्र के साथ दौड़ना है। और किसी ने  पहले से उत्कृष्टता के मापदंड तय कर रखे हैं, उनके साथ न्याय करना ज़रूरी होता है, इससे कम पर काम नहीं चलेगा। बहरहाल कोई भी तरीका हो दोनों का आउटकम संगीत का लुत्फ़ ही होता है, श्रोता के लिए और गायक के लिए भी।
पिछले लगभग डेढ़ साल से म्यूजिकल ट्रैक पर इस तरह की गायकी से अलवर के संगीत प्रेमी रूबरू हो रहे हैं "स्वरांजलि संगीत क्लब की मार्फ़त।
गत 10 अक्टूबर 2015 को स्वरांजलि संगीत क्लब ने "गाता रहे मेरा दिल..." एक संगीतमय शाम आयोजित की। इस संगीत संध्या के बहाने से अलवर के गायक कलाकारों ने किशोर कुमार की यादों को ताज़ा किया। इसी कार्यक्रम में जानेमाने संगीतकार रवीन्द्र जैन के निधन पर सबने मौन धारण करके श्रद्धांजलि दी। इस संगीत संध्या में अलवर के कलाकारों ने किशोर कुमार के गानों को अपनी आवाज में गाकर शाम को सुरमयी बना दिया। कार्यक्रम को फरमाइशी स्वरुप भी दिया गया था। श्रोताओं के अनुरोध पर कलाकारों ने गीत सुनाकर अपनी गायकी की परिपक्वता का परिचय दिया। नए पुराने सभी कलाकारों ने एकल, युगल, सामूहिक व मेंडली विधाओं में अपनी प्रस्तुतियाँ दी। इसी के समान्तर सञ्चालन भी बहुत सधा हुआ था। सरला जैन व महिपाल सिंह जी की उद्घोषक जुगलबंदी लगातार कार्यक्रम को रोचक बनाते हुए चल रही थी। दर्शकों के साथ सीधे संवाद बनाना व संगीत के गुरुओं चीनू जी व विनीत जी से किशोर कुमार जी के जीवन के विभिन्न रोचक प्रसंगों को सुनना जहाँ नयी पीढ़ी के लिए ज्ञानवर्द्धक रहा वहीं इन उस्तादों के लिए सम्मान स्वरुप भी था। विनीत जी व चीनू जी ने पिछले 10-15 वर्षों में एक पीढ़ी को तराशा है जिसके नतीजे दिखाई देते हैं।

स्वरांजलि संगीत क्लब अब तक सात ऐसी संध्याएं आयोजित कर चुका है। यह अब संगीतप्रेमियों का इतना बड़ा कुनबा बन गया है कि आदिनाथ कॉलेज का सभागार खचाखच भरने के लिए काफी है। इस संगीत क्लब ने अलवर के गायकों को एक माला में तो पिरोया ही है वहीं एक रसिक दर्शकों का एक समुदाय भी खड़ा किया है। यह क्लब आज एक बड़ी टीम है लेकिन निःसंदेह इसके प्रणेता गायत्री म्यूजिक के सचिन जी हैं। पिछले डेढ़ दशक से सचिन इस तरह के कार्यक्रम की पृष्ठभूमि रच रहे थे। उन्होंने एक-एक करके बरसों से म्यूजिक ट्रेक्स का संग्रह किया है। इसके साथ ही वे हमेशा लोगों को इन ट्रेक्स के साथ गाने की तालीम भी देते रहे हैं। जब भी कभी अलवर में इस शैली के गायन का मूल्याङ्कन होगा तो सचिन जी इसके प्रारम्भ में अकेले खड़े दिखाई देंगे। आज उन्होंने अपने सतत प्रयासों व इस तरह के कार्यक्रमों की बारंबारता से गायकों के समूह को एक मंच प्रदान किया है।
इस कार्यक्रम से जुडी कुछ उल्लेखनीय बाते है -
  • यहाँ कोई वीआईपी कल्चर नहीं हैं। खास और आम मेहमानों वाला फर्क नज़र नहीं आता।
  • कर्यक्रम में बच्चों से दीप प्रज्ज्वलन करवाना एक एक नयी पहल है।
  • एक ही जगह पर कार्यक्रम की बारंबारता से इवेंट व स्थान दोनों को पहचान मिलती है। निःसंदेह स्वरांजलि ने ही रंगकर्मियों के सामने यहाँ गतिविधियाँ करने का एक विकल्प दर्शाया। आज रंगकर्मी आदिनाथ सभागार को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।
पिछले दिनों स्वरांजलि की तरफ से यह आवाज आ रही थी कि वे अपने साथ नाट्य गतिविधियों को भी जोड़ने जा रहे हैं। अभी उसकी कोई रूपरेखा उभर कर सामने नहीं आई है। यदि ऐसा संभव होता है तो दोनों को फायदा होगा। संगीत और नाट्यकर्म में
बहुत कुछ है जो साझा हो सकता है।
स्वरांजलि परिवार को सफल प्रस्तुति के लिए बधाई।
दलीप वैरागी 
9928986983 
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Sunday, October 11, 2015

कहाँ है चौथी कक्षा के निबंध वाली गाय

गाय पर शायद दूसरी बार लिख रहा हूँ। एक बार तब लिखा था जब चौथी क्लास में था। या फिर आज लिख रहा हूँ। गाय पर लिखना मेरे लिए उस वक़्त भी मुश्किल था और अब भी है। तब गाय इतनी सरल थी और हमारी लेखनी बहुत ऊबड़खाबड़ " गाय के चार पैर,दो सींग होते हैं... गाय घास खाती है और हमें दूध देती..." ये चार पंक्तियों का निबंन्ध तब भी न सधता था। जरा सा हेर-फेर और मास्टर की छड़ी। आज जब लेखनी कुछ सधी है तो गाय पहले जैसी नहीं रही है।
बहरहाल गाय जब आज राजनैतिक चर्चा का मुद्दा बन गया है, अचानक मुझे तीन साल पुराना एक अनुभव याद आ गया।
बात राजस्थान की ही है। शिक्षा में काम कर रही एक संस्था के कार्मिकों के प्रशिक्षण चल रहा था। प्रशिक्षक दल में मैं भी था। उसी शहर के नजदीक एक बहुत बड़ी गौशाला है और उसका बहुत नाम भी। लोगों ने कहा कि आए हो तो एक बार गौशाला को भी देखो। एक शाम को हम पांच साथी गौशाला देखने निकल पड़े। सच में बहुत बड़ी गौशाला थी। वहां हजारों गाय थीं। बहुत व्यवस्थित रूप से प्रबंधन था। प्रबंधन के एक व्यक्ति ने हमें गौशाला का बड़े उत्साह से एक गाइड के रूप में भ्रमण कराया। उसने गौशाला की परिधि से बताना शुरू किया। जहाँ पर हजारों गाय थीं। गायों का अस्पताल, गायों का आइसीयू वार्ड, गायों का ऑपरेशन थियेटर व गायों का एम्बुलेंस। एक तरफ गायों के चारे का भंडार। बीमार गायों की सेवा में लगे अस्पताल के कार्मिक। हम अंदर की व्यवस्थाओं से बहुत प्रभावित हुए।
अब घूमते हुए थोड़ा भीतर की ओर आ गए। गाइड ने कहा कि इस भाग में सभी भारतीय नस्ल की गाय हैं। उन्होंने हमें तमाम देशी नस्लों के नाम व पहचान बताईं जो अब विस्मृत हो चुकी हैं। अभी तक हममे पूरी गौशाला देखने का उत्साह कायम था।
अब हम गौशाला के केंद्र के पास आ गए। गाइड ने हमें वहाँ रोक कर कहा, "अब हम गौशाला के मुख्य भाग में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ जो गाय हैं वे सब उस गाय की संतति हैं जिसे बरसों पहले इस गौशाला के संस्थापक लेकर आए थे।" यह भाग चारदीवारी के भीतर था। गाइड ने कहना जारी रखा, "इस हिस्से में मुस्लमान को प्रवेश की इजाजत नहीं!" यह सुन कर हमारी नींद खुली। हमें पहली बार अहसास हुआ कि हमारे प्रशिक्षण टीम में सलमा भी हमारे साथ है जो अब तक भ्रमण को उतना ही एन्जॉय कर रही थी जितना कि सब। पहली बार टीम दो हिस्सों में तकसीम होती दिखी। हम सन्निपात की स्थिति में थे। अचानक हमारे एक साथी ने सलमा को सुनीता संबोधित करते हुए कहा, "सुनीता तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, गाड़ी में आराम कर लो..."
आगे जाने का उत्साह अब नहीं था केवल जिज्ञासा भर थी कि अंदर का गौधन बहार से कितना भिन्न है जिसे प्राचीर में रखा है। गाइड के निर्देशानुसार जूते बहार खोल कर हम अंदर दाखिल हुए। अंदर भी केवल गाय ही थीं बिलकुल गाय जैसीं। वैसी ही जैसी चौथी क्लास के निबंध में होती थी - वही गाय, जिसकेे चार पैर और दो सींग होते थे... गाय घास खाती है और दूध देती है।" मुझे तो कोई भेद नज़र नहीं आया बाहर और भीतर की गायों में। भेद सिर्फ यहाँ के निज़ाम की सोच में ही नज़र आ रहा था। यह यात्रा दिमाग में कई सवाल छोड़ गई। इंसानों ने जो संकीर्ण दायरे खुद के लिए बना रखे हैं, उनके प्रतिबिम्ब वह इन बेजुबानों में क्यों देखना चाहता है? अपनी समाज व्यवस्था जानवरों पर क्यों आरोपित करना चाहता हैं?
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Monday, October 5, 2015

हास्य नाट्य समारोह के ठहाकों की गूंज अलवर की फिज़ाओं में कई दिन तक रहेगी

कल 4 अक्तूबर 2015 का दिन अलवर रंगकर्म में काफी महत्त्व का था। वह इस लिए कि अलवर में नवनिर्मित प्रताप ऑडिटोरियम में पहली बार कोई नाट्य गतिविधि संपन्न हुई। यूँ तो यह ऑडिटोरियम बने हुए लगभग दो साल का वक़्त हो गया है लेकिन रंगकर्मियों के लिए यह आज भी मरीचिका बना हुआ है। इसको बुक करने का शुल्क इतना अतार्किक है कि रंगकर्मी इसको बुक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। अंततः यह काम रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के देशराज मीणा ने कर दिखाया। और उन्होंने "हास्य नाट्य महोत्सव" के रूप में एक खूबसूरत शाम का अनुभव अलवर के दर्शकों के लिए रच दिया।
कल शाम प्रताप ऑडिटोरियम पर तीन नाटकों का मंचन हुआ जिसका विवरण इस प्रकार है -
पहला नाटक – “निठल्ला”
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य रचनाओं पर आधारित इस नाटक का निर्देशन देशराज मीणा ने किया। इस नाटक में दो अभिनेताओं दीपक पाल सिंह व अंकुश शर्मा ने अपने सधे हुए अभिनय से दर्शकों को आद्यंत जोड़े रखा। दोनों अभिनेताओं ने सादगी से मंच पर कथा का नैरेशन भी किया और विभिन्न चरित्रों को भी निभाकर दर्शकों को गुदगुदाया और  परसाई जी के व्यंग धार से कहीं दर्शकों के मानस पर नश्तर भी छोड़े। यह सधे हुए अभिनय की मिसाल ही है कि कोई अभिनेता बड़ी चतुराई से दर्शक दीर्घा में बेबाकी से फोन पर बात करते हुई दर्शक की भी खबर ले डाले, बिना अपनी भूमिका से विचलित हुए। इस व्यंग नाटक ने जहाँ इन अभिनेताओं ने नेता, नौकरशाह व संतों की पोल खोली वहीं आखिरी संवाद तक आकर दर्शक को भी नहीं छोड़ा और गिरेबां में झांकने के लिए मज़बूर कर दिया।
दूसरे नाटक " उसके इंतज़ार में" के लेखक निर्देशक प्रदीप प्रसन्न हैं । इन्होंने नाटक में अभिनय भी किया। प्रदीप इन दिनों अहमदाबाद में रहकर शोध कर रहे हैं तथा वहां रहते हुए उन्होंने वहां शौकिया रंगकर्मियों की एक अच्छी खासी टीम बना ली है, जो वास्तव में बहुत बड़ी बात हैं। अपनी टीम के साथ अलवर में मंचन के लिए आए थे। उसके इंतज़ार में एक पूर्णतया हास्य नाटक है।  इस नाटक में एक परिवार की कहानी है, जहाँ लड़की को देखने के लिए आए हैं। विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से प्रदीप हास्य रचते हैं। पारिवारिक नोकझोक है, नौकरानी से इश्क है, बेरोजगारी है व मनुष्य की सहज दुर्बलताएँ हैं । इन छोटी-छोटी स्थितियों के माध्यम से प्रदीप जहाँ गुदगुदाते हैं वहीं गंभीर चोट भी कर जाते हैं और अगले ही पल हास्य की मसाज भी कर देते हैं। एक नाटककार के रूप में प्रदीप प्रसन्न विधा की नब्ज़ पकड़ चुके हैं। उनसे इसी तरह और लेखन की आगे भी उम्मीद है।
तीसरे नाटक के रूप में मोलियार की रचना "बिच्छू " का मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन अंकुश शर्मा ने किया। अंकुश इस नाटक में भी प्रमुख भूमिका में थे। मोलियार की इस क्लासिक कृति के हिंदुस्तानी अनुवाद में दो परिवारों की कहानी है। जहाँ रूढ़िवादी कंजूस पिता भी हैं तो उनकी तथाकथित तरक्कीपसंद इश्कमिज़ाज़ सन्तानें भी।  इस पीढ़ी अंतराल और इस खाई को अपने अजीबोगरीब कौशल से सामंजस्य बनाने और उनकी खबर लेते हुए रहमत के किरदार को पूरी ऊंचाई पर लेकर जाते हैं अंकुश शर्मा। रहमत का किरदार सबको अपने इर्द-गिर्द मौज़ूद तुर्प के इक्के की याद दिलाता है जो किसी भी गाँव मौहल्ले के लिए उतना ही अपरिहार्य है जितना कि वह तिरस्कृत भी है। ये सारी परिस्थितिया गजब का हास्य रचती हैं। उर्दू ज़बान के शब्दों के साथ सभी कलाकारों ने उच्चारण की शुद्धता का ख्याल रखते हुए यह साबित किया कि वे प्रशिक्षित व पेशेवर अभिनेता हैं।
यह आयोजन एक दिन में कई बाते अलवर रंगकर्म को कह गया -
  • ऑडिटोरियम की शुल्क कम करने के लिए प्रशासन से मांग करना जरुरी तो है लेकिन उसके कम होने के इंतज़ार में बैठे रहना भी ठीक नहीं। जब तक उस जगह पर कोई गतिविधि नहीं होगी तो प्रशासन को उसकी जरुरत भी समझ नहीं आएगी।
  • यहाँ आयोजन होने से ही इसकी अंदर की खामी पता चली कि उसकी बनावट में बुनियादी चूक भी हुई हैं। साईक मंच के इतने पीछे चिपका कर लगाई गई है कि अभिनेता के मूवमेंट के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं। पंखे हैं नहीं, एसी लगे नहीं। दो घंटे की अवधि दर्शको को गर्मी में तलने के लिए काफी हैं।
  • नाटक को समय पर शुरू करना बहुत जरुरी है। लेकिन यह उतना ही दुर्लभ भी है। लेकिन कल का शो समय पर शुरू होने के पीछे निसंदेह देशराज की जिद को ही माना जा सकता है। इसके लिए देशराज साधुवाद के पात्र हैं। उन्होंने विशिष्ठ अतिथियों को भी आमंत्रित किया लेकिन उनके आदर सत्कार को बरक़रार रखते हुए उन्होंने दर्शको के समय व रसास्वादन को बाधित नहीं होने दिया।
  • इतनी महत्वपूर्ण गतिविधि की अगले दिन किसी अख़बार में कोई खबर नहीं मिलने पर अच्छा नहीं लगा। प्रिंट मिडिया की यह  दूरी समझ में नहीं आई।
  • इस रंग अनुभव को रचने में हालाँकि देशराज व प्रदीप अलवर के रंगकर्मी हैं लेकिन इनके अतिरिक्त पूरे अभिनेता दिल्ली जयपुर व  अहमदाबाद से थे। निःसंदेह इन अभिनेताओं ने अलवर के रंगकर्म को एक्सीलेंस के मापदंडों से परचित अवश्य करवाया। उम्मीद है भविष्य में अलवर के रंगकर्मी भी इस ऑडिटोरियम पर शिरकत करते दिखाई देंगे।
सारांशत: यह कहा जा सकता है कि रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित "हास्य नाट्य समारोह" के ठहाके की गूंज काफी समय तक अलवर रंगमंच की फिजा में गूँजेगी। अपनी तमाम मज़बूतियों के बावज़ूद यह कहे बिना बात ख़त्म नहीं की जा सकती कि यह हास्य का ओवरडोज़ भी था। काश! ये तीनो नाटक, तीन दिन क्रमिकता से मंचित होते तो माहौल और सघन बन सकता था। कुछ अधिक दर्शक जुटाए जा सकते थे। फिर भी आयोजकों बधाई , दर्शकों को बधाई !
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दलीप वैरागी 
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Friday, October 2, 2015

मोहन से महात्मा और नाटक

आज 2 अक्टूबर की तारीख है। पूरी दुनिया में इसे महात्मा गांधी जी की जयंती के रूप में मनाया जा रहा है। भारत सरकार  गांधी के जन्मदिन को स्वच्छ भारत अभियान के साथ जोड़ कर मना रही है। वह इसलिए कि स्वच्छता गांधी जी के लिए एक बड़ा मूल्य था।
Image result for gandhiमैं एक नाट्यकर्मी हूँ और यह सोच रहा हूँ क्या गांधी जी को रंगकर्म के योगदान के लिए भी याद कर सकता हूँ? अक्सर देखा है कि इन महान विभूतियों ने साहित्य, समाज संस्कृति या राजनीति पर अपने विचार रखे हैं तो नाटक पर भी कुछ न कुछ कहा होगा। इस सन्दर्भ में देखने पर उनकी जिंदगी का एक प्रसंग याद आता है जो यह बताता है कि गांधी जी के मोहनदास से महात्मा बनने में नाटक का बहुत योगदान है।
अपने बचपन में गांधी जी ने 'हरिश्चंद्र' नाटक देखा था। इस नाटक ने गांधी जी के बाल मन पर इतना असर डाला कि उन्होंने इस नाटक को बार-बार देखा। इस नाटक ने गांधी जी के जीवन की दिशा बदल कर रख दी। उनकी जिंन्दगी में सत्य के प्रति जो अटल आस्था थी उसका बीजारोपण हरिश्चंद्र  नाटक ने कर दिया। नाटक से ही बालक मोहन ने शायद बचपन में यह मूल्य ग्रहण किया कि चाहे कितनी ही विकट स्थिति ही क्यों न हो सत्य के मार्ग पर अटल रहना चाहिए। इस मूल्य को गांधी जी ने आपने पूरे जीवन में डेमोन्सट्रेट करके दिखाया।
इसी तरह एक दूसरी महान विभूति ईश्वरचंद विद्यासागर का एक प्रसंग याद आता है। एक बार एक नाटक मण्डली नील के किसानों पर अंग्रेज अफसरों के अत्याचार को प्रदर्शित करते हुए नाटक कर रही थी। ईश्वरचंद विद्यासागर जी भी नाटक में आमंत्रित थे और अग्रिम पंक्ति में विराजमान थे। अंग्रेज अफसर का पात्र निभाने वाले अभिनेता ने किसान पर अत्याचार का इतना जीवंत अभिनय किया कि विद्यासागर जी अपनी सीट से उठकर आए और अफसर का अभिनय करने वाले अभिनेता को जूते से दनादन पीटने लगे। बाद में अभिनेता ने उस जूते को अपने सात्विक अभिनय के उपहारस्वरूप अपने पास रख लिया।
इन दोनों ही नाटकों से एक बात साबित होती है कि इंसान के व्यवहारगत परिवर्तन का नाटक जबरदस्त माध्यम है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों में अहिंसा, सत्यनिष्ठा व संवेदनशीलता के मूल्य स्थापित हों तो हमें इस माध्यम की ताकत को समझना होगा। पहले उदहारण से जहाँ यह पता चलती है कि नाटक की कथावस्तु में अन्तर्निहित विचार (सन्देश या उपदेश नहीं) किस तरह दर्शक के मूल्यबोध का निर्माण करता है। यह कार्य केवल नाटक ही मजबूती से कर सकता है। क्योंकि ये मूल्य हम जिंदगी की राह पर चलते हुए ही सीखते हैं और हमारे इर्दगिर्द जो जिंदगी है उसमे इस हद तक मूल्यहीनता की मिसालें हैं जो हमारे मूल्यबोध को शीर्षासन करवाने के लिए काफी हैं। केवल नाटक ही ऐसा माध्यम है जो कृत्रिम रूप से आपके इर्दगिर्द एक जिंदगी सृजित कर देता है और आप एक सुनियोजित कथा के साथ लिपटे विचार यात्रा के सहयात्री होते हैं। एक सत्य की विजय और मूल्य की स्थापना में अनायास ही एक हिस्सेदारी हासिल कर लेते हैं।
नाटक न केवल विचारधारा को ही प्रभावित करता है बल्कि विचार का भावनात्मक रूप से परिष्कार करके कर्म में भी प्रवृत करता है जिसे ईश्वरचंद विद्यासागर जी के उदहारण से समझा जा सकता है।
उपरोक्त दोनों उदाहरण बताते हैं कि एक नाटक दर्शकों पर किस प्रकार असर डाल कर उन्हें शिक्षित करता है और ज्ञान आधारित व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। जरा सोचिए जो मंच के ऊपर होते हैं और जो दर्शक के लिए नाट्यानुभव सृजित करने की तैयारी में लगे होते हैं, जो महीनों चर्चाओं पूर्वाभ्यासों में अपने मन व शारीर को साधते हैं उनके लिए नाटक का अनुभव दर्शक से कुछ ज्यादा होता है। किसी पाठशाला सरीखा।
दरअसल नाटक अपनी सम्पूर्णता में किसी पाठ्यचर्या से कम नहीं होता। अगर उसे सूझबूझ के साथ किया जाए तो वह गुणवत्ता युक्त शिक्षा का एक पैकेज ही होता है।
विडम्बना यही है कि नाटक में शिक्षा की जितनी संभावनाएं हैं यह उतना ही शिक्षा व्यवस्था से बहिष्कृत भी है। मेरा अनुभव तो यही कहता है शिक्षा चाहे किसी भी स्तर की हो, किसी भी डिसिप्लीन की हो उसमें नाट्यकला जरूर शामिल होनी चाहिए। और वे केवल एक पुस्तक सरीखे साहित्य की किताब में न होकर बल्कि अपने जीवंत रूप में होने चाहिए। जिस दिन ऐसा हो पाया उस दिन फिर से शायद कोई मोहनदास  से महात्मा बन जाए। एक नहीं अनेक, अपने-अपने मौलिक स्वरूपों में।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, September 26, 2015

एक अमेच्योर एक्टर की डायरी - 1 : रटें या रमें


नाटक पर काम करते हुए कई बार आप वो कर रहे होते हैं जो दरअसल नहीं करना चाहते। नवोन्मेष केवल चाहे हुए को करने से ही नहीं होता, कई बार अनचाहा भी रचनाशीलता के अवसर दे जाता है। अरे! माफ़ कीजियेगा, इस ज्ञान का साधारणीकरण करके मत देखिए। ऐसा केवल मेरे केस में होता है। इसका मतलब यह भी नहीं कि मुझे नाटक करना पसंद नहीं है। लिहाजा परंपरा निभाते हुए जो नहीं चाहता, वही कर रहा हूँ। ट्रेन में बैठकर नाटक के संवादों को रट रहा हूँ। कल रिहर्सल पर निर्देशक की सवालिया नज़रों का सामना करना होगा, " क्या बात है अभी तक ....?" साथी अभिनेता दनादन डायलॉग बोल रहे है। उनकी डायलॉग-दुनाली में और व्यवधान क्यों डालूं! इस लिए ट्रेन के डेली यात्रियों के साथ गप्पबाज़ी करने और यात्रियों के चेहरों को उजबकों की तरह पढ़ने के स्थान पर स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूँ।

अब ट्रेन की ऊपर की बर्थ पर बैठ कर परांठे की मानिंद रोल करके रखे हुए रोल के पन्ने निकाल, सीधे करके पाठ को देख रहा हूँ। शुरू से आखिर तक । एक बार, दो बार .... बार-बार... क्रम व कवायद अनंत...। बात बनती हुई लग नहीं रही...  काश मस्तिष्क भी स्कैनर की तरह काम करता और एक दो बार आँखों से गुजारने के बाद एक जेरोक्स इमेज बन जाती पूरे ए-फॉर साइज... लेकिन ऐसा होता तो कब का हो हो जाता। स्केनिंग के लिए जरुरी है एक समतल शीट हो।  रोल की तहरीर समतल तो है लेकिन तक़रीर आड़ी-तिरछी है। भावनाओं के पिरामिड हैं विचारों के गर्त हैं और जिज्ञासाओं कंदराएँ हैं।बहुत उबड़ खाबड़ है। 3डी... नहीं,... 4डी... वह भी नहीं... अनंत डाइमेंशन हैं। इसका जहनी जेरोक्स संभव नहीं। पर... याद तो करना है। खुद पर खुद का दबाव बना रहा हूँ।
यह लो घोटा लगा के सब समतल किये दे रहा हूँ। अब सब
2डी में है ...सारा का सारा सपाट!... अब इस इसकी अनुप्रस्थ काट की सीधी-सीधी सतरें बना ली हैं। उन्हें तुरपाई करके एक चिक बना रहा हूँ ताकि मानस पटल पर आच्छादित किया जा सके। जितना चाहे खोलो, जितना चाहे लपटो, जितनी चाहिए रौशनी... क्या चिक के बाद रौशनी की चाहत या रह जाती है? याद तो करना ही है हर हाल में... रट के या रम के ! यह मेरा अब खुद पे खुद का दबाव है। मैंने अपना तरीका इज़ाद किया है... आप कैसे करते हैं?


- दलीप वैरागी 
9928986983 
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Friday, September 18, 2015

कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है

यह नाटक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय तबीजी, अजमेर की लड़कियों के साथ नाट्य कार्यशाला के दौरान तैयार किया गया।
-      (मंच पर टोली आकार गाना शुरू करती है। दो गायक पहले गाते हैं बाकी समूह उन पंक्तियों को दोहराता है।)
गायक     : आइए करें तमाशा जी,
आइए करें तमाशा जी।
सुनिए अपनी भाषा जी,
सुनिए अपनी भाषा जी।
ओ रे ओ मेरे देश के वासी
ओ रे ओ मेरे गाँव के वासी
गाँव के वासी, शहर के वासी
घर के वासी गली वासी
कोरस     : आइए करें तमाशा जी ....
गायक    : चाचा आओ, चाची आओ,
काका – काकी आप भी आओ
चिंटू मोनू का साथ में लाओ,
गोलु को तुम गोद खिलाओ
खाते आओ, गाते आओ  
आइए मम्मी पापा जी .....
एक          : लो भाई आगे, अब बोलो
गायक 1,2  : ( उसे आदर से दर्शकों में बैठते है। )
आओ बैठो नाटक देखो
नाक के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं
गायक           : दांत के खोल के फाटक देखो
कोरस           : नहीं जी 
गायक           : आँख के खोल के फाटक देखो
कोरस           : अरे नहीं भाई
सब             : कान के खोल के फाटक देखो
                 आइए करें तमाशा जी ....
दो               : अरे भाई क्या है आपके नाटक में?
गायक          : इस नाटक में बड़े-बड़े हैं
पेड़ों जैसे अड़े खड़े हैं
रीत रिवाज गले सड़े है 
माल दबाए चोर खड़े हैं
तीर तमंचा तान खड़े है
तीन व चार    : ( दोनों गायकों के कनपटी पर पिस्टल तानने का अभिनय)
                 ठाँय – ठाँय
गायक           : कहीं नहीं होती सुनवाई
                 कितना ही चिल्ला लो भाई
                 ऐसा क्यों होता है भाई...
(कलाकारों की मंडली भाग कर मंच पर आती है।)
गायक           : अरे भाई कौन हो? क्यों घुसे चले आ रहे हो?
अभिनेता       : हो गया आपका तमाशा... अब अपना पेटी-बाजा उठाये और प्रस्थान कीजिए
गायक           : क्यों ?
अभिनेता       : अब हमारा रोल है।
(गाते हुए निकाल जाते हैं। )
                 आइए करें तमाशा जी ...
सूत्रधार         : नमस्कार ... हमारे नाटक में एक कहानी है...
पाँच            : डायरेक्टर साब आप भूल रहे हैं
सूत्रधार         : क्या ?
पाँच            : इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ हैं।
सूत्रधार         : हाँ तो भाई ... मैं कह रहा था कि ... इस नाटक में एक नहीं दो कहानियाँ है...
कोरस           : बहुत खूब ... एक टिकट में दो फिल्में
छ:              : डायरेक्टर साब आप फिर भूल रहे हैं
सात            : अब क्या है भाई ...
सात            : इस नाटक में दो नहीं तीन कहानियाँ है।
कोरस           : क्या बात है...
सूत्रधार         : बिलकुल इस नाटक में दो नहीं तीन-तीन कहानियाँ हैं। 
आठ             : आप बिलकुल भुलक्कड़ हैं डायरेक्टर साब... इस नाटक में चार – चार कहानियाँ                  है।
एक             : ये नाटक तो कहानियों की किताब है...
कोरस           : जिसमें कहिनियाँ बेहिसाब हैं...
                 आइए करें तमाशा जी... (गाते हुए मंच का चक्कर लगते हैं)
एक             : यह कहानी सीता की है... 
दो               : जिसके कुछ सपने हैं ।
तीन             : यह कहानी गीता की है...
चार             : जिसके सपनों पर समाज का पहरा है।
पाँच            : यह कहानी अंजली की है...
छ:              :  जिसका दुख और भी गहरा है।
सात            :  यह कहानी रीना की है...
आठ             : जो सपनों को सच करना चाहती है।
कोरस           : ये कहानी हम सब की है....
                 आइए करें तमाशा जी ...
( अस्पताल का दृश्य सीता के पिता बेड पर लेटे हैं। दृश्य में सीता के चाचा, चाची व सीता हैं। )
चाची           : (सीता को दुलारते हुए) हाय मेरी प्यारी भतीजी... माँ तो पहले ही मर गई...                  अब पिता भी बहुत बीमार हैं। तुम चिंता मत करो... तुम मेरे पास रहना ... मैं                  तुझे अपनी बेटी की तरह रखूंगी।
(चाचा बाहर आता है। )
चाचा           : बेटी तू अपने पिता के पास बैठ जरा...
चाची           : अजी क्या हुआ ?
चाचा           : ज्यादा देर नहीं अब
चाची           : इतनी देर मत करो जमीन के कागज़ का काम पहले...
चाचा           : हो गया...
(अंदर से सीता के रोने की आवाज़ आती है। सब रोते हुए सीता के पापा के चारों और घेरा बनाते है। दृश्य बदलता है। )
गायक           : सीता की अब ये कहानी हुई
                 चाचा-चाची के मन में बेईमानी हुई...
                 फंस गई देखो उनके जाल में
                 सीता कि अब ये कहानी हुई ...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा... सीन वन... टेक वन ... एक्शन
चाचा           : सीता मेरे कपड़े प्रेस हो गए?
सीता            : हाँ, ये रहे
चाचा           : ये क्या ! शर्ट जला दी...
चाची           : सीता बर्तन माँज दिए ...
सीता            : जी चाची ... ये रहे 
चाची           : ये बर्तन माँजे है? कितने गंदे हैं... (बर्तन फेंकती है। )
चाचा           : मेरे जूते पोलिश हो गए क्या
सीता            : जी, ये लो ॥
चाचा           : देखो कितने गंदे हैं ... ये पोलिश की है?
(थप्पड़ मार कर गिरा देता है।)
चाची           : इससे कुछ नहीं होता ... मैं कहती हूँ इसे घर से निकाल बाहर करो ...
(दोनों उसे खींच कर घर से बाहर निकाल देते हैं।)
सूत्रधार         : कट ... कट ...कट ... माफ कीजिएगा, हम इस कहानी को यहीं रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों ? क्यों भाई क्यों ??
सूत्रधार         : क्यों कि इससे आगे कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है...
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : सीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है।
एक             : सीता का अपहरण हो सकता है।
दो               : सीता किसी गिरोह के चंगुल में फंस सकती है।
तीन             : उससे भीख मँगवाई जा सकती है।
चार             : इसके लिए उसे अपाहिज बनाया जा सकता है।
पाँच            : उससे बाल मजदूरी कारवाई जा सकती है
छ:              : उसका बलात्कार किया जा सकता है।
सात            : उसे मारा जा सकता है।
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी सीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
सूत्रधार         : लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन टू , टेक वन ... एक्शन
(मंच के दोनों कोनों पर सामांतर दो दृश्य बनते हैं। एक में बच्चे खेल रहे हैं दूसरे में बड़े बात कर रहे हैं। )
बच्चे             : कोड़ा ए जमालशाही ... पीछे देखे मार खाई ...
बच्चा एक       : चलो गुड्डा-गुड्डी का खेल खेलते हैं।
बच्चा दो         : हाँ... हाँ... खेलते हैं ...
व्यक्ति एक      : और रामलाल जी क्या हाल है
व्यक्ति दो       : बहुत अच्छा... आप... आप कैसे हैं?
बच्चा तीन       : अरे तेरी गुड़िया तो बहुत सुंदर है...
बच्चा चार       : तेरा गुड्डा भी बहुत खूबसूरत है...
व्यक्ति एक      : तुम्हारी लड़की बहुत सुंदर है...
व्यक्ति दो       : आपका लड़का भी बहुत खूबसूरत है...
बच्चा तीन       : तुम्हारी गुड़िया क्या करती है?
बच्चा चार       : मेरी गुड़िया तो स्कूल जाती है। तुम्हारा गुड्डा क्या करता है?
बच्चा तीन       : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
व्यक्ति एक      : आपकी लड़की क्या करती है?
व्यक्ति दो       : मेरी लड़की तो स्कूल जाती है... और आपका लड़का क्या करता है?
व्यक्ति एक      : मेरा गुड्डा भी स्कूल जाता है।
बच्चा तीन       : मुझे तुम्हारी गुड़िया पसंद आई
बच्चा चार       : मुझे भी आपका गुड्डा पसंद है।
व्यक्ति एक      : भाई मुझे आपकी लड़की पसंद है
व्यक्ति दो       : मुझे भी आपका लड़का पसंद है।
बच्चा तीन       : चलो गुड्डे – गुड्डी की शादी कर देते हैं
व्यक्ति एक      : भाई रिश्ता पक्का !
व्यक्ति दो       : समझो पक्का बिलकुल पक्का।
व्यक्ति तीन     : चलो मुँह मीठा करो।
(शहनाई व बाजे की आवाज के साथ कलाकार बच्चों के चारों और घूमते हैं। संगीत अब मंत्रोचार में बदल जाता है। कोरस बच्चों के चारों और घेरे में आ जाता है। )
सूत्रधार         : कट... कट... कट...  माफ कीजिएगा इस कहानी को हम यही रोक रहे हैं।
कोरस           : क्यों (कोरस का प्रत्येक व्यक्ति बारी-बारी से “क्यों” बोलते हुए पीछे अर्धवृत्त मे            खड़े हो जाते हैं। )
चार             :  सर, हमने मेहनत की है...
पाँच            : जम कर रिहर्सल की है...
कोरस           : आखिर क्यों रोक रहे हैं ?
सूत्रधार         : क्योंकि इससे आगे यह कहानी कोई भी मोड़ ले सकती है।
कोरस           : जैसे ?
सूत्रधार         : गीता के साथ अब कुछ भी हो सकता है...
एक             : उससे दहेज मांगा जा सकता है...  
दो               : दहेज के लिए पीटा जा सकता है...  
तीन             : घर से निकाला जा सकता है...
चार             : जलाया जा सकता है...
पाँच            : उसकी पढ़ाई छुड़वाई जा सकती है...
छ:              : वह कम उम्र में माँ बन सकती है...
सात            : इस वजह से उसकी मौत भी हो सकती है...
आठ             : वह बल विधवा बन सकती है...
नौ              : उसकी सारी जिंदगी तबाह हो सकती है...
कोरस           : उसके साथ कुछ भी हो सकता है...
सूत्रधार         : ऐसी गीता एक नहीं सैकड़ों हैं...
कोरस           : लाखों हैं...
सूत्रधार         : करोड़ों हैं...
कोरस           : हम सब के आस-पास हैं।
(कोरस धीरे- धीरे गाता है। )
कोरस           : सुनिए अपनी भाषा जी...
                 आइए करें तमाशा जी...
(मंच के दोनों छोर पर बारी बारी से सीन बनेंगे पहला सीन पूरा हो जाने पर फ्रीज़ हो जाएगा, दूसरी साइड में दूसरा बनेगा। )
सूत्रधार         :  लाइट... साउंड... कैमरा ... सीन थ्री, टेक वन ... एक्शन
(एक लड़की रास्ते से जा रही है। दो लड़के अपनी बाइक पर आते हैं और चारों ओर बाइक से चक्कर लगाकर उसे छेड़ते हैं। )
लड़का 1        : अरे यार क्या लड़की है।
लड़का 2        : आजा, चलती है क्या ...
लड़की          : बत्तमीज...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... लाइट... साउंड... कैमरा... सीन थ्री... टेक टू... एक्शन...
(बस आती है। कंडक्टर आवाज़ लगा रहा है। बस पर लोग चढ़ते हैं। दो लड़कियां चढ़ती है। उनके पीछे दो लड़के भी चढ़ जाते है। )
लड़का 3        : अरे देख तेरे आगे वाली को
लड़का 4        : क्या बाल हैं इसके (हाथ पकड़ता है। लड़की वहाँ से हट जाती है। )
लड़का 3        : आगे वाली को भी देख ( लड़का 4 झटके से उसके ऊपर झुकता है।)
लड़की 2        : डोंट टच मी...
लड़का 4        : कसम से पूरी अंग्रेज़ है...
सूत्रधार         : कट... कट... कट... माफ करना, हम इस नाटक को...
कोरस           : हम यहीं समाप्त कर रहे हैं ...
सूत्रधार         : नहीं, हम इस नाटक को समाप्त नहीं करेंगे...
कोरस           : तो फिर कौन करेगा?
सूत्रधार         : (सामने दर्शकों से ) आप करेंगे...
सूत्रधार         : (किसी दर्शक विशेष को टार्गेट करते हुए) जी हाँ, आप करेंगे... क्यों करेंगे न...            आइए जी ... अब मंच आपके हवाले है। इस दृश्य को यही खत्म करना चाहें तो                  यहीं खत्म करें। आगे बढ़ाना चाहें तो आगे बढ़ाएँ। सुखांत बनाना चाहें सुखांत                    बनाएँ... दुखांत बनाना चाहें तो दुखांत बनाएँ... आइए .... ( इसी प्रकार दो तीन           दर्शकों को मंच पर फ्रीज़ हुए सीन को परिवर्तित करने को कहें। कोशिश यह हो कि         मुद्दे पर जम कर चर्चा भी हो सके। )


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दलीप वैरागी 
09928986983 




 
  


Saturday, September 12, 2015

नाटक को पाठशाला से प्रेक्षागृह में निर्देशक बदलता है

बच्चों के नाटक प्रायः प्रदर्शनधर्मी (परफॉर्मेंस ओरिएंटेड) नहीं होते हैं। वे अपने नाटक दर्शक को मद्देनज़र रख कर बनाते ही नहीं । बच्चों के नाटकीय खेलों पर तो यह बात सौ फीसदी फिट बैठती है। नाटकीय खेलों में तो दर्शक अयाचित होता ही है। वे अपने इन खेलों को आइसोलेशन में खेलते हैं। आइसोलेशन से अभिप्राय है कि उन्हें वयस्कों की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं होती। हो भी क्यों न, ज्यादातर उनके खेलों के किरदार यही वयस्क लोग होते हैं। और यह आप जानते हैं कि राजा नंगा है ये बात छोटे बच्चे ही बोल सकते हैं। इसलिए उनकी सेंसरशिप से मुक्त बच्चे अपनी छोटी सी दुनिया में इस विराट संसार को निर्ममता से परख रहे होते हैं। अगर आप थोड़े समय के लिए बचपन के कुछ नाटकीय खेलों को याद कर पाएं तो यक़ीनन आपको एक दो ऐसा मिल जाएगा  जो बड़ों के हिसाब से नाकाबिले बर्दाश्त होगा।
बड़ा होने पर यानि स्कूल जाने की अवस्था में दर्शक का थोडा दखल बढ़ता है। यहाँ पाठ्यचर्या के भीतर या बहार उन्हें नाटक करने के लिए कहा जाता है। बच्चे इन नाटकों को उतनी ही शिद्दत से तैयार करते हैं जितना वे उसे अपने स्वायत्त नाटकीय खेलों में करते थे। स्कूल में खेले गए नाटकों में उनका लक्ष्य दर्शक होते तो हैं लेकिन उन्हें अब भी दर्शकों की परवाह कतई नहीं होती। वे अपने प्रदर्शन में पूरा समय व ध्यान दुनिया के बारे में खुद की समझ को व्यक्त करने या फिर उसे दुरुस्त करने के उपक्रम में लगाते हैं। परफॉर्मेंस के बीच में यदि किसी पात्र की पगड़ी खुल गई तो फिर कथा उतनी देर तक स्थगित रहती है जब तक कि उसका दुरूस्तीकरण नहीं हो जाता है। हो सकता है कि विभिन्न प्रकार की पगड़ियों, पंजाबी, राजस्थानी, मराठी या फिर किसान की या नेता की पगड़ियों को बांधकर देखा जाए और इसी पर उनकी चर्चा का सिलसिला निकल पड़े और मूल कथा थोड़ी देर स्थगित हो जाए।
मुख़्तसर में यह कहा जा सकता है कि हम बच्चों के नाटकों चाहे वे किसी भी फॉर्म में हों महज दर्शक बनकर नहीं जुड़ सकते। यदि आप शिक्षक हैं , यानि सीखने व सिखाने में यक़ीन रखते हैं और बच्चे को स्वतंत्र सोच रखने वाला व्यक्ति मानते हैं, तो आप बच्चों के साथ नाटक पर काम करते वक़्त आनंद से नहा जाएंगे।
किसी भी नाटक को पाठशाला से प्रेक्षागृह में निर्देशक बदलता है। दर्शक की एंट्री निर्देशक की मार्फ़त होती है। यहीं से नाट्यकला स्कॉलस्टिक से को स्कॉलस्टिक की और चल पड़ती है। निदेशक यदि शिक्षक अभिवृत्तिशुदा है  तो यह भेद अस्वीकार भी किया जा सकता है। पाठशाला का प्रेक्षागृह में रूपांतरित होना कोई बुरी बात नहीं है। अंततः नाटक एक प्रदर्शन कला है। उसे अपने अंजाम तक जाना ही होता है। दरअसल निर्देशक दर्शक का लक्ष्य करके अभिनेता या विद्यार्थी को दूसरा सामाजिक पक्ष दिखता है। अभी तक अभिनेता अपने अंदर संसार की छवि को तलाश रहा होता है। निर्देशक दर्शक का संधान करके उसे चौखटे ( फ्रेम ) में रखता है। जो दूसरे के दृष्टिकोण को भी समझने में मदद करता है। इस प्रक्रिया से अभिनेता या विद्यार्थी सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपने अंदर सामजिक कौशल, सम्प्रेषण कौशल  व अपने सौंदर्यबोध में परिष्कार करते हैं। निदेशक मन की छवि को जन की छवि के पास रख कर अभिव्यक्ति का प्रेरण देता है। मुझे लगता है शिक्षा में नाट्यकला की सार्थकता इसी में है कि पाठशाला प्रेक्षागृह में रूपन्ततित हो और प्रेक्षागृह पाठशाला में। यह तभी हो सकता है जब यही फ्लेक्सिबिलिटी शिक्षक और निर्देशक में भी हो। 
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 

Thursday, September 3, 2015

लघु नाटिका - सब कुछ सड़क पर...

(इस लघु नाटिका को जयपुर शहर के मोती कटला माध्यमिक विद्यालय की लड़कियों के साथ नाट्यकार्यशाला के लिए लिखा गया था। इसका मंचन 6 जून 2015 को बिड़ला ऑडीटोरियम में किया गया।)

सूत्रधार    : नमस्कार
कोरस    : आदाब, सतश्रीअकाल
सूत्रधार   : हमारी टीम ने एक नाटक तैयार किया है।
कोरस    : कैसा नाटक, कौनसा नाटक?
सूत्रधार            : इस नाटक के माध्यम से हम...
कोरस    : सन्देश देंगे... उपदेश देंगे... बड़ी-बड़ी बाते करेंगे...
सूत्रधार            : अरे नहीं भाई
कोरस    : तो फिर क्या है आपके नाटक में?
सूत्रधार            : इस नाटक में एक कहानी है...
एक       : और वो कहानी शर्म से पानी पानी है।
दो        : पूरी स्टोरी सड़ी-गली है।
तीन      : इस नाटक में इस शहर की हर गली है।
चार      : इस नाटक में कचरे की भरमार है।
पाँच      : पूरा नाटक ही बदबूदार है।
छः, सात : अजब सा नाटक!
आठ, नौ : गजब का गजब का नाटक !!
कोरस    :  .....अजब का नाटक,
          गजब का नाटक।
          अहा जी नाटक,
          वाह जी नाटक।
          यहाँ भी नाटक,
          वहां भी नाटक।
सूत्रधार            : अरे रुकिए भाई, रुकिए... बैठिये जी बैठिये... पहले मैं इस नाटक की स्टार कास्ट से तो आपका      परिचय करवा दूँ... एक-एक करके आइए और अपना परिचय दीजिए...
मेहरबान... कदरदान... हमारे स्टार कलाकारों के लिए जोरदार ताली बजाइयेगा..नहीं तो बाद में पछताइयेगा... तालियाँ
एक      : मेरा नाम शालिनी है। मैं एक शिशिका  हूँ। मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ। और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलता हूँ।
एक      : कौन बोला?
कोरस   : (छोटे बच्चों की तरह) कोई नहीं मैडम जी।
दो       : मेरा नाम आनंद है। मैं एक इंजीनियर हूँ। मैं बड़े-बड़े पुल व बिल्डिंग्स बनाता हूँ। और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलता हूँ।
दो       : क्या?
कोरस   : जी हाँ साहब।
तीन     : मेरा नाम सुषमा है। मैं एक हाउस वाइफ हूँ। मैं घर का सारा काम करती हूँ। और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाती हूँ।
तीन     : क्या? (डाँटते हुए)
कोरस   : सॉरी मम्मी जी।
चार     : मेरा नाम राजू है। मैं एक डॉक्टर हूँ। लोगों का इलाज करता हूँ और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाता हूँ।
चार     : क्या?
कोरस   : जी हाँ जनाब
पाँच     : मेरा नाम सिमरन है। मैं एक टूरिस्ट हूँ। जगह-जगह घूमती हूँ और...
कोरस   : कचरा भी फैलाती हूँ।
छः       : मेरा नाम रामलाल है। मैं किराने का व्यापारी हूँ और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाता हूँ।
सात     : क्या कहा?
कोरस   : सही कहा
आठ     : मेरा नाम शाहरुख़ है। मैं एक विद्यार्थी हूँ। हमेशा क्लास में अव्वल आता हूँ और मैं...
कोरस   : कचरा भी फैलाता हूँ
आठ     : क्या कहा
नौ, दस           : बिलकुल सच।
कोरस   : .......सच सच बिलकुल सच
          बात कहेंगे सारी सच
          चाहे तो लग जाए धक्
          धक् धक् धक् धक्....
(कोरस लगातार दोहराते हुए घूमता है।)
दृश्य - 1
(दो व्यक्ति कार में बैठे हैं। एक ड्राइव कर रहा है तथा दो की गोद में बच्चा है।)
एक      : सॉरी आज कंस्ट्रक्शन साइट पर देर हो गई।
दो       : इट्स ओके..... ला...लल्ल ..ला... ओह इसने तो सूसू कर दिया।
एक      : जल्दी से इसका डाइपर बदलो।
दो       : (डाइपर बदलती है।)  अरे इसका कांच तो खोलो। ( डाइपर को बहार डालने के लिए हाथ बहार  निकलती है)
कोरस   : (ज़ोर से चिल्लाकर) ये sss फैंका sss...स्कूटर वाले के मुंह पे।
बात कहेंगे सारी सच
चाहे तो लग जाए धक
दृश्य - 2
तीन     : नमस्ते गुरूजी आपका स्कूल कैसा चल रहा है?
चार     : बहुत अच्छा चल रहा है।
पाँच     : छोड़ो यार चाय पीते हैं।
तीनो    : चलो ( एक थड़ी पर बैठ कर चाय पीते हैं और चाय ख़त्म होने पर डिस्पोजल कप को एक साथ गली में डालने का अभिनय करते हैं।)
कोरस   : (जोर से चिल्लाकर) ये ssss फैंका ssss
दृश्य - 3
छः       : (झाड़ू लगा रही है।)
सात     : रज्जो sss
आठ     : माँ मैं खेलने जा रही हूँ।
सात     : इसे फैंक के आओ
आठ     : कहाँ डालना है माँ?
कोरस   : बहार गली में
आठ     : (फैंकने का अभिनय करती है)
कोरस   : ये ssss फैंका sss
बात कहेंगे सारी सच
चाहे तो लग जाए धक
दृश्य - 4
नौ       : वाओ !... वंडरफुल !!
दस      : ब्यूटीफुल सिटी
नौ       : कितनी गर्मी है यहाँ
दस      : लो पानी पियो। ( दोनों बोतलों से पानी पीते है। एक साँस में ख़त्म करते हैं और वहीं डाल देते हैं।)
कोरस   : ये sss फैंका sss
ये फैंका वो फैंका
इधर फैंका उधर फैंका
यहाँ फैंका वहाँ फैंका
(सब एक घेरे में आते है। आधा घेरा भी हो सकता है।)
कोरस   : हम सब भारतवासी हैं।
हिन्दू - मुस्लिम
सिख - ईसाई
अमीर-गरीब
शहरी-ग्रामीण
पढ़े-अनपढ़े
हम सब में गजब की एकता है -
शैम्पू का खली पाउच
डिस्पोजल कप
तेल की खाली शीशी
पानी की बोतल
घर का कचरा
बच्चे का डाइपर
गुटखे की पीक
फैंक देते है हम
सारे सड़क पर
सारे सड़क पर......
सूत्रधार : तो साहब यह नाटक यही समाप्त होता है।
एक      : रुकिए
दो       : ऐसा क्यों होताहै...
तीन     : एक तरफ हम सफाई पसंद करते हैं और...
चार     : दूसरी और हम गंदगी फैलते हैं।
कोरस   : बताओ... बताओ... बताओ...
सूत्रधार           : मुझसे नहीं, इनसे पूछो ( दर्शकों की और इशारा करते हुए।)
कोरस   : बताइये... बताइए आप बताइए ही बताइये
सूत्रधार सवालों के माध्यम से दर्शकों से इस मुद्दे पर बात करता है? कोशिश यह होनी चाहिए कि दर्शक खुल कर इस चर्चा में भाग लें
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 


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