Wednesday, September 28, 2011

बच्चों का रंगमंच: कहीं भी, कभी भी ...

मैं जिस दृश्य का ज़िक्र यहाँ करूंगा हो सकता आपको मामूली लगे । दरअसल सुबह जब मैं ऑफिस के लिए निकला तो कॉलोनी के नुक्कड़ पर जो मुख्य सड़क से जोड़ता है । इसी नुक्कड़ पर एक फोटोग्राफर की दुकान हुआ करती थी जो अब उसने खाली कर दी है । फोटोग्राफर दीवार पर जो चित्रपट्ट छपवाते हैं ताकि शौकीन लोग उसके आगे खड़े होकर फोटो खिंचवा सकें। दुकान खाली होने पर भित्तिचित्र लगा रह गया था। जब मैं दुकान के आगे से गुजरा तो वहाँ का दृश्य देख कर ठिठका। वहाँ 7 से 10 वर्ष उम्र के दो लड़के थे । एक लड़का उस वॉलपेपर के सामने किसी अदाकार की तरह खड़ा था और दूसरा किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर की तरह फोटो खींचने का अभिनय कर रहा था । खिंचवाने वाला अलग-अलग अंदाज़ मे खड़ा होकर खिंचवा रहा था । मैंने थोड़ी देर तक रुक कर इस अभिनय को देखा फिर यह जान कर कि इस आयोजन में मैं निसंदेह अयाचित दर्शक हूँ । मेरी उपस्थिती इस अभिनय व्यापार को कहीं रोक न दे इसलिए मैं न चाहते हुए भी वहाँ से निकल गया ताकि यह नाटक अपनी संपूर्णता तक पहुँच कर खत्म हो सके। पूरे रास्ते मैं इसी घटना पर सोचता रहा बच्चों के बारे मे, नाटक के बारे में कि कैसे ज़रा सी फुर्सत मिलते ही बच्चे अभिनय शुरू कर देते हैं । कितनी जल्दी सब एक सुर मे आ जाते हैं । एक सुर मे आते ही नाटक के सब साजो समान भी जुट जाते हैं और शुरू हो जाता है खालिस अभिनय। यहाँ बच्चों और बड़ों के नाटक मे एक अंतर होता है कि जहां बड़ों का रंगमंच दर्शकों की बाट देखता रहता है और जब तक दो ढाई सौ दर्शक नहीं जुट जाते, रंग ही नहीं जमता लेकिन बच्चों के नाटक में एक भी दर्शक रंग में भंग डाल सकता है। दरअसल यह अंतर इस लिए है कि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न होते हैं। बड़े जहां अपने नाटक के माध्यम से लोगों को शिक्षित कर रहे होते है जबकि बच्चों के नाटक मे वे खुद सीख रहे होते हैं(बड़े भी सीख सकते हैं)। वे नाटक के माध्यम से अपने पास-पड़ौस की दुनिया को समझ रहे होते हैं । एक अनुभव है। गाँव मे एक मेरी भतीजी है योगिता । जब वह लगभग तीन साल की थी वह शाम के समय अपनी उम्र बच्चों के साथ घर की छत पर खेल रही थी। अचानक ऊपर से रोने की आवाजें आईं । भैया छत पर गए और वहाँ का दृश्य देख कर दंग रह गए। वहाँ का दृश्य कुछ इस प्रकार था कि योगिता फर्श पर लेटी हुई थी और उस पर कपड़ा कुछ इस प्रकार डाल रखा था जैसे मरने के बाद किसी मृत शरीर को ढंका जाता है। बाकी सभी बच्चे उसे चारों तरफ से घेरे हुए रुदन-विलाप कर रहे थे। कुछ गले लग कर वैन कर रहे थे । भैया कुछ देर तो देखते रहे फिर उनके लिए असहनीय होने लगा । इतने मे ही बच्चों को बाहरी आदमी की उपस्थिती पता चल गई । खेल खत्म, सब भाग गए सिवा योगिता के, वह अब भी अपनी भूमिका से बाहर नहीं आई थी और वैसे ही पड़ी हुई थी । भैया ने झिझोड़ कर खड़ा किया और पूछा कि ये क्या ड्रामा है ? उसने बताया कि पिछले दिनों पड़ौस के घर मे वैशाली के भाई की मृत्यु हुई तब लोग ऐसे ही .... तो बच्चे पड़ौस की जो उन्होने समाज मे घटते हुए देखा उसे अपनी तरह से समझ रहे हैं। तात्कालिक घटना यह है और सब बच्चे अनायास ही मृत्यु से जुड़े अपने–अपने देखे अनुभवो को यहाँ शेयर करेंगे और नई अवधारणाएँ बनाएँगे । मृत्यु जैसे यथार्थ को उन्होने कैसे देखा समझा। मृत्यु का समाज और परिजनों पर क्या असर पड़ता है उस सच को अभिनय के माध्यम से दूसरे के स्तर पर महसूस करके देखना चाहते हैं । बच्चे बहुत से जटिल और दार्शनिक महत्व के प्रश्नों के समाधान ऐसी ही सरल प्रक्रियाओं से समझ लेते हैं। कुछ सवालो के जवाब यहाँ अपने आप साफ होने लगते हैं कि “क्या अभिनय सीखने की चीज़ है या नहीं ?” या “क्या हर इंसान को रंगमंच की कला का अहसास होना चाहिए?” यह जान लेना चाहिए की अपनी ज़िंदगी मे ज़्यादातर अभिनय 5-6 साल की उम्र तक हम कर लेते हैं । हाँ , यह अलग बात है तब उसका स्वरूप अलग होता है । बचपन का अभिनय प्रदर्शनोन्मुखी नहीं होता है। वह खुद के सीखने के लिए है। वहाँ सिर्फ दर्शक के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उनकी दुनिया मे सब अभिनेता है, सब दर्शक है, सब समीक्षक हैं। आप उनकी दुनिया में दर्शक बन कर शामिल नहीं हो सकते, उनकी दुनिया का हिस्सा बने बिना तो आप एक जासूस की तरह ही उनका रंगमंच देख सकते हैं । उनकी दुनिया का हिस्सा होना आसान बात नहीं है। जबकि इसके उल्टा होता है हम पहले जासूस बनके उनके रंगमंच में झाँकते हैं तो हमे उनके नाटक या तो बचकाने लगते है या असहनीय। क्योंकि कई बार बच्चों के नाटकों का विषय ऐसे होते हैं जिनके बारे मे हम मान कर चलते है कि बच्चों को ऐसे विषयों पर नहीं सोचना चाहिए। लेकिन वे सोचते हैं । वे अपने नाटको मे बड़ों कि दुनिया के उन कोनों को भी झांक जाते है जो उनके लिए बंद हैं। फिर हमारा जासूस तानाशाह मे रूपांतरित हो जाता है और हम उनके मासूम नाटकों पर सेंसरशिप लगाकर उन्हें तथाकथित रूप से सामाजिक बनाने की कवायद में लग जाते हैं। किशोर अवस्था तक पहुँचते उसके अभिनय के सहज सोते को सुखा डालते हैं। बाद मे अभिनय की शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों मे हजारों खर्चते हैं। यदि इस कवायद में कोई निकाल के आता है तो उसके बाद तैयार कलाकार को खड़ा करने के लिए दान, अनुदान और अकादमियां लगी हुई हैं।
इसके बाद हम कोशिश करके जो रंगमंच बना पाते हैं वो होता है एक विभाजित रंगमंच; जिसके एक धडे मे अभिनेता है और उसकी टोली तथा दूसरी तरफ है दर्शक, जो लाख मनुहारों के बाद प्रेक्षागृह तक आ जाता है। दृश्य की समाप्ती पर ताली बजाता है, नाटक के आखिर मे अभिनय पर फतवा देकर चला जाता है। दर्शक और अभिनेता कभी एक सुर मे नहीं आ पाते हैं । यहाँ तक कि कोई रिश्ता ही नहीं बन पता है। यहाँ एक सुर का मतलब किसी सिंफनी के साज़ों की तरह एक नोट पर बजना या फिर एक तरह से सोचना नहीं है। यहाँ आशय सार्थक संवाद से है । यह संवाद ज़्यादातर लोक नाट्यों मे मिलता है। इस तरह के लोकनाट्यो मे दर्शक तटस्थ या स्थिति से अलगाव कायम रखने वाला दर्शक नहीं होता है। वह जहां कहानी के साथ वैचारिक रूप से जुड़ता है । नाटक के दौरान अभिनेता का उससे संवाद भी होता है और कथानक के विकास मे सहयोग भी करता है । मेरे गाँव का का अनुभव है, हम स्कूल के एक समारोह मे नौटंकी “अमरसिंह राठौड़” कर रहे थे । एक युवा कलाकार जो कि इसमे रामसिंह कि भूमिका निभा रहा था वह अपने संवाद भूल रहा था । लेकिन तभी दर्शकों मे से एक टीचर जो कि बाहर किसी गाँव से आए हुए थे सफा बांध कर मंच पर आ गए और उसकी तलवार लेकर उसे दर्शकों मे बैठ कर देखने को कहा । उन्होने नाटक के उसी बिन्दु से अपनी भूमिका को उठाया । नाटक की गति और गुणवत्ता मे जरा भी गिरावट नहीं आई । अत: यह कहा जा सकता है कि अधिकतर लोक नाट्य बच्चो के नाट्य के निकट बैठते है । जहां पर दर्शक सिर्फ दर्शक नहीं है बल्कि उसका नाटक मे एक्टिव पार्टीसिपेशन होता है।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Wednesday, September 7, 2011

Theatre : सच को साधने का यन्त्र

यह २००६ - ०७ की बात है हम राजस्थान टोंक व धौलपुर जिले के स्कूलों में quality education project के तहत स्कूलों में educational support  का काम कर रहे थे | हर महीने हम स्कूलों का विज़िट करते | तीन दिन तक विद्यालय में पूरा समय रह कर अवलोकन करते थे |  टीचर्स बच्चों को पढाते कैसा हैं ? जो विधाएं टीचर्स शिक्षण में अपना रहे हैं वे कैसी हैं  और उनका बच्चों के प्रति व्यवहार कैसा ? कक्षा में बैठ कर देखते और जहाँ भी लगता हम टीचर को सपोर्ट करते | इस सिलसिले में एक स्कूल ऐसा था जहाँ सब चीजें दुरुस्त नज़र आतीं थी | टीचर्स समय पर विद्यालय आते , पूरा समय कक्षाओं में रहते यहाँ तक कि दो तीन शिक्षक तो विद्यालय समय के आलावा रुक कर अतिरिक्त कक्षाएँ भी लेते | एक चीज़ के बारे में कोई पक्का नहीं कर पा रहा था कि इस स्कूल में दंड की क्या स्थिति है? हालाँकि कई बार मैंने टीचर्स को गाली व डांट-फटकार जैसे असंवेदनशील व्यव्हार बच्चों से  करते देखा था लेकिन शारीरिक दंड को भौतिक रूप से नहीं देखा। हालांकि दंड के दोनों ही स्वरूप जघन्य हैं जबकि स्कूल में डंडे की उपस्थिति बराबर नज़र आती रही | मुझे लगता कि इस विद्यालय में बच्चों को दंड तो मिलता है लेकिन जिन दिनों मैं आता हूँ उन दिनों में टीचर संयम रख लेते हैं | ऐसा नहीं कि हम बच्चों से बात नहीं करते थे | स्कूल में हमारा अधिकतम समय बच्चों के साथ ही व्यतीत होता था | हम अध्यापक की उपस्थिति में और उसकी गैरमौजूदगी में भी बच्चों से बात करते  |  दंड के विषय में में हमने बच्चों से कई बार पूछा लेकिन बच्चों ने यही कहा कि उनके स्कूल में पिटाई नहीं होती है | एक दिन हमने एक युक्ति सोची | हम अक्सर क्लास में बच्चों के साथ नाटक पर काम करते थे | हमने सब बच्चों से कहा कि आज हम नाटक करेंगे | बच्चे बहुत खुश हुए | हमने बच्चों के चार समूह बना दिए और बच्चों से कहा कि आप अपने-अपने समूह में एक नाटक तैयार कर के लाएं जिसका विषय ‘क्लास रूम में में शिक्षक पढ़ा रहा है’  हो सकता है |
नाटक तैयार करने की प्रक्रिया से बच्चे पहले ही परिचित थे , बच्चे स्वतंत्र रूप से मिलकर थीम पर नाटक तैयार करते अगर जरूरत पड़े तो वे किसी की भी मदद ले सकते थे | जब सब समूहों के नाटक तैयार हो गए तो शाम को प्रार्थना स्थल पर बच्चों ने मंच तैयार कर जो नाटक improvise किये थे, वे करके दिखाए | नाटक देख कर सब दंग रह गए | नाटक के सभी दृश्यों में जो बच्चे टीचर बने थे वे लगातार पढ़ा रहे थे, सवाल पूछ रहे थे और ना बता सकने पर विद्यार्थी बने बच्चों को पीट रहे थे | नाटक के दृश्यों के साथ टीचर्स भी पूरा साधारणीकरण कर चुके थे | फुल एन्जॉय कर रहे और बच्चों के पिटाई के action देख कर टिप्पणियाँ भी कर रहे थे “अरे यह तो हैडमास्टर साहब की स्टाइल है |”  “ये तो बिलकुल रामजीलाल लग रहे हैं |  ... ”
ऐसा कैसे हो गया? शुरू में पूछने पर टीचर्स और बच्चे दोनों ही इनकार कर रहे थे कि हमारे स्कूल में पिटाई नहीं होती है जबकि नाटक में बच्चों ने जाहिर कर दिया और देखते हुए टीचर्स ने रियलाइज भी किया | दरअसल नाटक विधा में ऐसा है क्या ?  क्या यह झूठ पकड़ने की की मशीन है ?
नहीं। दरअसल यह सच को साधने का यन्त्र है। इसमें फॉयड का मनोविश्लेषण का सिद्धान्त काम करता है। नाटक हमारे अचेतन में सेंध लगता है। हमारा अचेतन वह स्टोर है जहाँ हमारी वह अतृप्त इच्छाएँ या वो भावनाएँ रहती है जो दबा दी  गयी होती हैं | जिनको प्रकट  करने पर सेंसरशिप होती है |  अभिनय की प्रक्रिया दरअसल स्वप्नों की तरह व्यवहार करती है | जिस प्रकार फॉयड सपनों की व्याख्या करते हुए कहते है कि   स्वप्नों के पीछे एक मूल विचार होता है और एक  स्वप्न की विषय वस्तु होती है | स्वप्न के पीछे का उद्दीपक विचार प्रतीकात्मक रूप से स्वप्न की विषय वस्तु के रूप में प्रकट होता है और स्वप्नों की व्याख्या करके मूल विचर या उसके पीछे की अतीत की घटना को पकड़ा जा सकता है | नाटक भी इसी तरह व्यवहार करता है जब आप दूसरे के स्तर पर जाकर अनुभव करते हैं तो सेंसरशिप ढीली पड़ती है और अचेतन में कहीं गहरे बैठा खुद का अनुभूत सच दूसरे के बहाने से फूट पड़ता है  | यहाँ बच्चे और टीचर दंड के बारे में बताना नहीं चाहते हैं क्योंकि बच्चों का जाहिर करने का अपना डर है और टीचर में कही अपराध बोध है | इस कारण दोनों प्रत्यक्ष बताना नहीं चाहते हैं लेकिन नाटक के मार्फत दोनों ही इस सच को स्वीकारते हैं |
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Tuesday, September 6, 2011

नाटक, स्कूली बच्चे और हम !

थियेटर पर मैंने ये अनुभव अलग-अलग समय में यहाँ वहाँ लिखे थे। Irom Sharmila Vimarsh ने फेसबुक पर जो बहस शुरू की है उसी बहाने से मैं अपने रंगमंच संबंधित लेखों को नेक जगह एकत्र कर रहा  हूँ । यह मैंने अपने दूसरे ब्लॉग बतकही से निकाला है। बहरहाल नया-पुराना चलता रहेगा ...
अभी हाल ही शिक्षा के क्षेत्र के आला लोग विद्यालयों का निरीक्षण करके लोटे उन्होंने वहाँ से लौट कर एक बहुत ही विश्लेष्णात्मक रिपोर्ट बनाई जिसमे अधिकतर यह लिखा था कि बच्चों को क्या नहीं आता | क्या आता है , यह नहीं देखा गया । ... इसमें एक बात प्रमुखता से यह थी कि बच्चों को नाटक करना नहीं आता | बच्चों से कहने पर उन्होंने नाटक नहीं दिखाया | यह बात उस स्कूल के लिए कही गयी जहाँ नियमित रूप से सैटरडे थियेटर होता है | फिर मामला क्या हो सकता है ? ''आप नाटक करके दिखाओ '' क्या किसी ग्रुप को नाटक करने के लिए इतना भर कह देना काफी होता है ? क्या यह केवल इतना ही है "चलो बेटा पोएम सुनाओ ..." नाटक सिर्फ इतना नहीं होता बल्कि इससे बहुत ज्यादा होता है | बच्चो के अकादमिक कौशल और कला कौशल को आंकने का एक ही टूल नहीं हो सकता कला को आंकना कक्षा में जाकर नौ का पहाड़ा या पर्यायवाची पूछने जैसा नहीं है | अगर ऐसा नहीं होता तो करिकुलम निर्धारित करते वक्त इनको सहशैक्षिक गतिविधियों में न रख कर अकादमिक में ही रखा गया होता | हर कला का अपना एक अनुशासन होता है उसी में उसको आंकने के टूल भी होते हैं | उस अनुशासन को समझे बिना आप आप कला का आकलन नहीं कर सकते | नाटक के सन्दर्भ में मोटी--मोटी दो तीन बातें निहित हैं कि यह टीम के बिना नहीं होता और प्रदर्शन से पहले टीम का एक सुर में होना भी बेहद जरूरी है | दूसरी बात यह है कि प्रदर्शन से पहले नाटक लंबे अभ्यासों को मांगता है तब जाकर मंच तक पहुंचता है | तीसरे यह कि प्रदर्शन से तुरंत पहले तयारी के लिए बहुत कुछ सामान मंच के लिए जुटाना पड़ता है | ये बाते स्कूल के बच्चों के लिए भी उतनी ही लागु होती हैं जितनी कि एक प्रोफेशनल दल के लिए होती हैं | अब सोचें कि जब आप किसी स्कूल का निरीक्षण करने जाते हैं तो क्या इतनी फुर्सत निकाल कर जाते हैं ? जब आप बच्चों से नाटक करने के लिए कह रहे होते हैं तब आप उनसे किस तरह का रिश्ता कायम करते हैं ? आपके शब्दों में आग्रह होता है या आदेश , बहुत कुछ आपकी उस वक्त कि मुख मुद्रा पर भी निर्भर करता है | हां , बच्चे नाटक कि जिस विधा के जबर्दस्त माहिर होते वह है रोल प्ले | उन्हें कोई स्थिति बताइए वे मिनटों में नाटक इम्प्रोवाइज कर के ले आते हैं | अत : जब भी आप बिना नोटिस के दो घंटे के लिए किसी स्कूल में जाएँ तो आप कक्षा में जाकर सत्रह का पहाड़ा तो जरूर पूछें लेकिन नाटक के लिए कहने से पहले बहुत बाते ध्यान रखनी पड़ेंगी | आप खुद अपने घर में ही छोटे बच्चे से पूछ कर देख लें कि जब महमान आने पर उससे कहते है कि बेटा चल अंकल-आंटी को पोएम सुना तब वह कैसा महसूस करता है ? सच जाने सबसे निरानन्द कि स्थिति में वह बच्चा ही होता है | हमारे यहाँ स्कूल- कॉलेजों में कलाएं विद्यार्थियों के लिए ऐच्छिक ही रहती आयीं हैं ताकि बच्चे अपनी रूचियों के हिसाब से जुड सकें | सांस्कृतिक समारोह में किसी बच्चे को जबरन किसी एक्टिविटी में भाग लेने के लिए नहीं कहा जाता था | लेकिन अब देखने में आया है कि शहरो के कुछ अंग्रेजी स्टाइल के स्कूलों में हर बच्चे को भाग लेना ही पड़ता है चाहे बच्चे कि रुचि है या नहीं | मै शहर के एक नामी प्राईवेट स्कूल में नाटक तैयार करवाने गया था नाटक के आलेख के बारे में पूछने से पहले उनकी दिलचस्पी इस बात में थी कि क्या मैं इस नाटक में उनके स्कूल के अस्सी बच्चों को खपा सकता हूँ या नहीं | आखिर अभिभावकों को उनका बच्चा मंच पर नज़र आना चाहिए | बच्चे का आनंद कहाँ है इसकी परवाह किसको है?
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Sunday, September 4, 2011

थियेटर, अभिनेता और दर्शक के बीच लेनदेन भर है... न कम न ज्यादा।

फेसबुक पर  थियेटर को लेकर चल रही चर्चा के सिलसिले में विकी तिवारी का लेख 'जय थियेटर' पढ़ा। इसी लेख ने रंगमंच पर अपने विचार लिखने को प्रोत्साहित किया। इस लेख में उन्होने रंगमंच के बड़े सवाल उठाए हैं। 
उनका कहना है -
भरतमुनि का नाट्यशास्त्र जिसे पंचम वेद कहा गया है, आज अपने अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है. अपने शहर में, साल भर में ३-४ छोटे बड़े नाट्य समारोह, कुछ अन्य नाट्य मंचन आयोजित हो जाने के बाद भी, केवल नाटक देखने के शौकीनों और रंगकर्मियों के परिजनों के अलावा, और कोई नहीं दिखतावहीं सिंगल स्क्रीन सिनेमा एवं मल्टीप्लेक्स में आपको राजा से लेकर रंक तक दिख जायेंगे फिल्म देखते हुए और वो भी बाकायदा टिकेट लेकर, फिर चाहे वो टिकेट ३० रूपये की हो या ३०० की... ये रंगमंच का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है।
विकी जी अनुभवी रंगकर्मी हैं। उनका 7 साल का सक्रिय रंगकर्म का अनुभव है। इस क्षेत्र में सात साल बहुत होते हैं। क्योंकि यहाँ कोई लंबा टिकता ही नहीं। दो तीन नाटक किए नहीं कि सब बॉलीवुड का रुख करते हैं। अधिकतर का क्या होता है यह सब जानते हैं। बाकी चार-छः जो ईमानदारी से थियेटर करने के लिए रुकते हैं उनके लिए यहाँ संघर्ष, चिंता, हताशा और निराशा इस कदर हैं कि जल्दी ही टूटन आ जाती  है। विकी भाई यहाँ पूरे हिंदी रंगमंच की पीड़ा को आवाज़ दे रहे हैं। 
दरअसल रंगमंच ऐसी विधा है जहां अखिल विश्व के तमाम कला – कौशल, गीत-संगीत, नृत्य, पेंटिंग, मूर्तिशिल्प तथा स्थापत्य एक अनुशासन मे मिलकर एक समग्रता का निर्माण करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी रूचि और सामर्थ्य के हिसाब से इसमे जुड़ सकता है। लेकिन विडम्बना ये है कि इस मजबूती के बावजूद थियेटर की विधा आज सबसे उपेक्षित है। जबकि इसकी आनुषंगिक कलाएँ अपने ज़ुदा-ज़ुदा स्वरूप में आज ज्यादा मजबूत हैं। आज विभिन्न टीवी चैनलों पर जितने भी टैलेंट हंट के शो हैं, सब गीत व नृत्य कलाओं के आ रहे हैं। कहीं आपने अभिनय का टैलेंट हंट किसी चैनल पर देखा है? पाँच-छः साल पहले ज़ी टीवी ने करवाया था जो मुश्किल से दो सीज़न भी पार नहीं कर सका। नाटक विधा समूह का काम है। ग्रुप वर्क एक बहुत बड़ी ताकत है। यह स्वत: सिद्ध है और इसके लिए प्रमाणों की जरूरत नहीं है। नाटक के साथ विडम्बना यही है कि जहां ग्रुप वर्क इसकी मजबूती है, वहीं इसकी कमजोरी भी है । हमारे यहाँ समूह में काम करने की एक अजीब संस्कृति है कि शुरू में अपना दम लगाकर टीम वर्क करते हैं और फिर शीघ्र ही समूह में तंहाइयाँ खोजने लगते हैं। सफलता की तरफ बढ़ा हर कदम तन्हाइयों की तरफ ढकेलता है। हमारे यहाँ सफलता की अवधारणा सब जगह एक जैसी है, चाहे वह अर्थशास्त्र हो, राजनीति शास्त्र या फिर समाज शास्त्र। जिसके अनुसार सफलता की सीढ़ी का ऊपर जाकर संकरा होना लाजिमी है। अत: सीढ़ी के शिखर पर तन्हा व्यक्ति ही बैठ सकता है, समूह के लिए यहाँ स्थान नहीं होता है।
दरअसल सफलता का मूल्यबोध भी उलट कर देखने की जरूरत है। वस्तुत: नाट्य विधा की सार्थकता यही है कि वह टुकड़ा-टुकड़ा लघुताओं को रिश्तों के ताने-बाने मे पिरो कर एक भव्य, विराट समग्र की रचना करती है। रिश्तों की यह प्रक्रिया ऊष्मा देती है, दोनों को – समूह को भी और व्यक्ति(एक्टर) को भी। यही ऊष्मा कलाकार को संजीवनी प्रदान करती है। सफलता के शिखर पर पहुँच कर यही रिश्ते रास नहीं आते। तंहाइयाँ गहराने लगती हैं और ऊष्मा का सोता सूख जाता है। हमें पता तक नहीं चलता। कर्म (अभिनय) का प्रेरण भावना से उठता है और भावना का उद्दीपन अनुभवों से आता है। सफलता के शिखर पर खड़े कलाकार के पास रह जाता है गठरी भर अहंकार ! फिर ताउम्र चंद सफलताओं के जमाखर्च से ही काम चलता रहता है। नियति इतनी निर्मम है कि दोनों में से कोई नहीं बचता, न व्यक्ति, न समूह। मेरे शहर मे जितने भी थियेटर ग्रुप खड़े हुए थे सभी के साथ देर सवेर यही हुआ। विकी का उपरोक्त बयान वर्तमान के नाट्य परिदृश्य का बयान तो करता है लेकिन कोई समाधान नहीं सुझाता है। हाँ इतना जरूर है कि वे लोगों से एक भावुक अपील करते हैं –
“सभी अखबार एवं राष्ट्रीय फिल्म व समाचार पत्रिकाओं में एक नियमित कॉलम निश्चित करें जो नियमित, निरंतर, निश्चित रहे।  जिसमें, जैसे कि हर शनिवार-रविवार को शहर में नाट्य कला से जुडी गतिविधियों का उल्लेख हो। मेरा ऐसा मानना है कि इससे जनता नाट्य-कला के प्रति जागरूक एवं गंभीर होगी. जब तक रंगमंच को seriously लिया ही नहीं जायेगा, उसे अन्य कार्यों की तरह एक दैनंदिन कार्य के रूप में नहीं देखा जायेगा तब तक तो कुछ हो ही नहीं सकता ... बहरहाल, मेरा मीडिया और देश की जनता से अनुरोध है कि भविष्य में जब कभी आपके अथवा किसी अन्य शहर में कोई नाटक एवं नाट्य समारोह आयोजित हों तो उन्हें देखने अवश्य जाएँ। क्योंकि किसी भी फिल्म की तरह ही इसमें भी प्रकाश व्यवस्था, मंच निर्माण, संगीत आदि जैसी चीज़ों पर कई उनींदी रातों की तन तोड़ मेहनत रहती है, जिसे दर्शकों के सामने महज़ १-२ घंटों के लिए प्रस्तुत किया जाता है और इतना सब करने के बाद भी दर्शकों से वैसा फीडबैक नहीं मिलता, तो ऐसे में कलाकार का हतोत्साहित होना, उसका मनोबल गिरना लाज़मी है।“
इस तरह की अपील करने में कोई बुराई नहीं। यह अकसर होती रही हैं। मगर यहाँ दिक्कत यह है कि मर्ज सही जगह से पकड़ में नहीं आ पाता है। दरअसल मर्ज जब खुद में हो तो इलाज़ सामने वाले का नहीं करना होता है। हम मीडिया से कोई उम्मीद नहीं कर सकते हैं। यह पीपली लाइव वाला मीडिया है। मीडिया के चरित्र को समझना बहुत मुश्किल है । (मीडिया पर मेरे दो लेख “अखबार या इश्तिहार !” तथा “मीडिया का असली चेहरा कौनसा है?” इसी ब्लॉग पर छप चुके हैं देखें।) मीडिया से उम्मीद करना खुद को भुलावे में रखना है। मीडिया सिर्फ मुनाफा देखता है। रही दर्शकों की बात तो दर्शक नाटक देखना चाहते है। हमने 2002 में जब अपना पहला नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ किया तो हम 500 लोगों के पास 30 रुपए का टिकट लेकर गए। हमे याद नहीं है कि किसी ने भी टिकट खरीदने से मना किया हो। नाटक के वक़्त हमने एक प्रश्नावली के माध्यम से दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ भी जानी। लगभग सभी दर्शकों ने कहा कि हम प्रेक्षागृह तक आकार टिकट लेकर नाटक देखना चाहते हैं बशर्ते शहर में नियमित फ्रिक्वेंसी मे नाटक हों, और नाटक की भाषा लोगों के समझ में आने वाली हो। पहली बात से यह स्पष्ट है कि सब नाटक देखना चाहते हैं। यहाँ कोई मुफ्त पास नहीं मांगता। यह मुफ्तखोरी वहाँ होती है, जहां इसका रिवाज हो। क्या अपने किसी मल्टीफ्लैक्स के सामने फ्री पास लेकर खड़े किसी व्यक्ति को देखा है। फ्री पास इसलिए मांगे जाते हैं क्योंकि वे मिलते हैं। यह मुफ्तखोरी की संस्कृति दिल्ली में मंडी हाउस के आस-पास ही पनपी है। वहीं बड़ी अकादमियाँ और स्कूल हैं सरकारी पैसे से चलने वाली ... अगर नाटक के कार्मिकों की तनख़्वाहें और मंचन का खर्च सरकारी खजाने से आएगा तो फिर दर्शक को मुफ्त बैठाओ या टिकट से क्या फर्क पड़ता है? ऐसा नहीं यह सिर्फ सरकारी सहायता प्राप्त मंडलियों के साथ है। मैं एक बार अपने शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी के पास गया और कहा कि हम लोगों ने सोचा है कि आगे से हम सब टिकट बेचकर ही नाटक दिखाया करेंगे। उन्होने कहा कि मैं भी टिकट से ही दिखाता हूँ। ये बात अलग है कि एक ही बड़ी टिकट बेच देता हूँ। अब आप बताएं कि किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान से 25-50 हजार लेकर भला टिकट बेचने की जहमत क्यों उठाने लगे। मुफ्त पास की मांग वहीं के पढे-लिखे कलाकार ही करते है। आम आदमी की न तो फ्री पास की औकात न आदत। 
दरअसल नाटक कलाकार और दर्शक के बीच का लेनदेन है। जब इनके दरम्यान कोई तीसरा बिचोलिया आ फँसता है, तब मामला बिगड़ता है। अभिनेता को दर्शक के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। जवाबदेही पैसा तय करता है और जब पैसा कोई तीसरा देगा तो भला अभिनेता अपनी कला में जनता के सरोकारों को क्यू लाएगा। वह तो अपने सेठ के नाम की बीन बजाएगा। जो दर्शक के इस रिश्ते को समझता है, वही सही मायने में प्रोफेशनल थिएटर करता है। यही प्रोफेशलिज़्म हम नुक्कड़ पर बैठ कर मजमा लगाकर खेल दिखाते मदारी से सीख सकते हैं। वह बरसों से एक ही स्क्रिप्ट दोहरा रहा है, वही संवाद बोल रहा है। आज भी वह आपको बीच रास्ते में रुकने के लिए मजबूर कर देता है। बकायदा खेल दिखाता है। दस रुपए देने के लिए कहता है और आपकी जेब का नोट फिर एक बार बाहर आने को मचल जाता है। उसके बाद वह शर्तिया मर्दानगी वाला तेल और चमत्कारी प्रभाव वाली अंगूठी बेच कर चला जाता है। यह वह दो कारणों से  ऐसा कर पाता है, एक वह जनता की नब्ज़ समझता है कि वे क्या चाहती हैं, दूसरे वह जनता के साथ जनता की भाषा मे बात करता है। उसने स्तानीस्लोवस्की और माइकल चेखव नहीं पढे हैं। बस उसने इस नुक्ते को पकड़ा है कि उसकी रोजी रोटी दर्शकों पर है। वह अपने काम के लिए अकादमियों का मुह नहीं ताकता है।
दूसरी बात जो हमें चौकने वाली थी कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ की भाषा लोगों की समझ में नहीं आती है। यह मैं किसी दक्षिण भारतीय या उत्तर पूर्व के शहर की बात नहीं कर रहा बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे बसे अलवर शहर की बात कर रहा हूँ। ऐसे और कितने ही नाटक हैं जिन्हें हम महान कहते है, दरअसल वे हैं भी, लेकिन क्या आज भी उनकी भाषा दर्शकों की समझ में आती है? तब हमे लगा कि हमारा चश्मा मोटा हो गया है। अचानक उसका नंबर बढ़ गया है। इस बात ने हमें ये तो सिखा दिया कि हमें कौनसे नाटक नहीं उठाने हैं, जब तक कि आषाढ़ का एक दिन जैसे नाटकों के जनता संस्करण नहीं आ जाते।
मेरा तो मानना है और पूरी उम्मीद भी है कि थियेटर के दिन बदलेंगे लेकिन समाधान अपने अंदर ही तलाशने होंगे। बहुत सारी बाते हैं जिनको कहने की इच्छा है लेकिन लेख बड़ा होता जा रहा है। बाकी फिर कभी।
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Friday, September 2, 2011

मैं, मेरा गाँव, मेरे सपने

यह स्टोरी  इससे पहले " अनौपचारिका " (समकालीन शिक्षा चिंतन की मासिक पत्रिका) के मई 2011 अंक मे प्रकाशित हो चुकी है। मार्च के आखिर महीने में उरमूल सीमांत, बीकानेर मे उन वंचित वर्ग किशोरियों का सम्मेलन आयोजित किया गया जो पिछले एक दशक मे उरमूल के शिविरों मे पढ़ी हैं  या प्रेरणा केन्द्रों से जुड़ी रही हैं । यहाँ  कुछ किशोरियों की केस स्टडी लिखने के लिए उनसे साक्षात्कार किए, जिनमे यह जानने का प्रयास किया गया कि उरमूल से जुडने के बाद उनकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आया है। अनौपचारिका में यह कुछ काट-छांट के साथ छपी थी, यहाँ पूरी दी जा रही है ।  

द्वारिका, उम्र 19 वर्ष
गाँव - डीवाईके, बीकानेर
बी ए प्रथम वर्ष की पढ़ाई स्वयंपाठी के रूप मेन पढ़ाई कर रही हैं

यह कहानी उस जगह की है जो हिंदुस्तान की पश्चिमी सीमांत पर है, जहां गाँवों के नाम नहरों के नाम पर रखे जाने का चलन है । पर अब शायद द्वारिका के नाम पर गांवों के रखे जाएँ  । 19 वर्षीय द्वारिका विश्नोई से बात करके मैंने खुद को जितना गौरवान्वित महसूस किया शायद इतना पहले कभी नहीं। किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों के साथ काम करने का जो मेरा अनुभव रहा है उसके अनुसार जहां इस उम्र मे रूमानी कल्पनाओं के सतरंगी सपनों मे ही अधिकतर वक़्त जाता है वहीं इस लड़की से बात करके पता चला कि इस छोटी सी उम्र मे भी किशोर सामाजिक मुद्दों जेंडर, हैल्थ और लोकतन्त्र पर गहरी समझ ही नहीं रखते वरन अपने जीवन में भी उन मूल्यों को व्यवहार मेन ल रहे हैं ।

बीए प्रथम वर्ष मे पढ़ रही द्वारिका विश्नोई तीन बहनों और एक भाई  में सबसे छोटी है ।  द्वारिका से पूछा कि आप प्राइवेट क्यों पढ़ रही हैं?    "घर वाले कहते हैं कि कॉलेज मे पढ़ाई नहीं होती है । वैसे भी गाँव मे लड़कियों के लिए ' पढ़ना है  तो पढ़ो नहीं तो घर बैठो' वाला माहौल है। "

" यूं भी लड़कियों को बाहर भेजने की मनाही है। " उरमूल बज्जू से प्रेरणा मंच का प्रशिक्षण लिया है।

उसमे क्या सीखा?

उसने कहा कि प्रशिक्षण मे जेंडर, हैल्थ,पेंटिग,शिक्षा, कपड़ों की रंगाई - छपाई व सिलाई जैसे विषयों पर समझ बनाने का काम होता है।

" मुझे किताबें पढ़ना अच्छा लगता है बज्जू से अक्सर किताबें ले जाती हूँ। "

इन दिनों कौनसी किताब पढ़ी है? हमने पूछा।

' ज़िम्मेदारी की शक्ति ' आजकल यह किताब पढ़ रही हूँ। ' यह किताब  परसेनलिटि  डेवेलोपमेंट पर है।

'अखबार रोज पढ़ती हूँ । रोज भेदभाव की खबरें छपती हैं । समाज से भेदभाव समाप्त करना चाहती हूँ। समाज में लड़कियों को आगे नहीं आने देते हैं। गाँव मे मैं अकेली लड़की हूँ जो आगे आई हूँ। '

' जो आगे नहीं आ रही हैं उनके लिए क्या कर रही हो? '

' 32 हैड (गाँव का नाम ) में 2005 में उरमूल का कैंप लगा था । शिविर के शिक्षकों ने कैंप में कुछ लड़कियों को भेजने की ज़िम्मेदारी मुझे दी । तीन मुस्लिम लड़कियां थीं । एक 9-10 साल की, दूसरी 15 तथा तीसरी 17 साल की थी । दरअसल उनकी शादी हो रही थी और उनके घरवाले उनको कैंप मे भेजने से मना कर रहे थे । मैं उनके घर वालों से बात करने गई । संयोग से लड़कियों के ससुर भी वहीं मौजूद थे । मैंने उनसे बात की और उनके सामने उन्हीं के समुदाय की दो लड़कियों के उदाहरण रखे जिनका बाल विवाह हुआ था और प्रसव कि जटिलताओं के कारण उनकी मौत हो गई थी। लड़कियों के ससुर मान गए। दो लड़कियों की शादी रोक दी गई । बड़ी का विवाह हो गया । उसका गौना भी तीन साल बाद हुआ। '

' इतना सब कैसे कर पाई ?'

'सब किताबें पढ़ कर सीखा है । उरमूल कैम्पस से हर तरह की मदद मिलती है।'

वैसे भी मैं किसी से नहीं डरती हूँ। पुलिस में जाना चाहती हूँ । बीएसएफ़ का फॉर्म भर रखा है ।'

लेकिन पुलिस में जाने के लिए तो बहुत तैयारी करनी पड़ती है।

' मेरी रेस बहुत अच्छी है । मैंने 2005 मे रेस लगाई थी , पूरे बीकानेर मे पहला पुरस्कार जीता था । रोज सुबह पाँच बजे उठ कर छः किलोमीटर दौड़ती हूँ। गोला फैक का भी अभ्यास करती हूँ । अपने साथ तीन और लड़कियों को भी दौड़ती हूँ । '

आप 19 साल की हैं और अभी पंचायत के चुनाव होकर चुके हैं, क्या आपने मताधिकार का प्रयोग किया?

' हमारी पंचयत तीन गांवों को मिलकर बनी है। हर गाँव से तीन-तीन उम्मीदवार खड़े हो गए थे। '

'ऐसे में किसको वोट डालना है यह तय करना मुश्किल रहा होगा ?'

' बिलकुल नहीं, मैंने एक नौजवान को वोट डाला था। '

' वो जीता?'

' नहीं वह हार गया । '

आपने अनुभवी और पुराने लोगों को वोट क्यों नहीं दिया?'

' पुरानों की तो पुरानी ही सोच है । इनके विचारों में बदलाव की गुंजाइश कम है। इतने सालों से ये लोग पंचायत में हैं लेकिन इनकी खुद की लड़कियां अनपढ़ हैं। मेरा तो स्पष्ट विचार है कि जो खुद की लड़कियों को नहीं पढ़ा सकते वह दूसरों की बेटियों के लिए क्या करेंगे ? नौजवानों की सोच नई है, उनमें कुछ करने का जज्बा तो है। '

आपने जिसको वोट दिया, उससे कुछ अपेक्षाएँ हैं?

' हनुमान कुम्हार नाम है उसका । मकान की चिनाई का काम करता है । सोचा अगर वह एक-एक ईंट जोड़ कर मकान खड़ा कर सकता है तो वह गाँव की नींव भी मज़बूत बना सकता है। '

' जीत जाता तो सोचा था स्कूल को ठीक करेगा, टीचर अच्छे होंगे, लड़कियां पढ़ने के लिए बाहर नहीं जा  पाती हैं, इसलिए गाँव के स्कूल को 12 वी तक करवाएगा... लेकिन गाँव वाले समझ नहीं पाये... हाँ पापा की सोच अच्छी है लेकिन वे भी गाँव के हिसाब से ही देखते हैं। '

यह सारी बातचीत सुन कर मेरी आँखों के सामने मेरी उम्र के उन सारे नौजवानों के चेहरे घूम गए जो चुनावों मे कपड़े बदल-बदल कर वोट डाला करते... यह भी सोच रहा था कि जब मैं द्वारिका की उम्र में था तब क्या कर रहा था... तब हमें कहाँ इल्म था... मेरी आंखे नम हो गई।

जेंडर को लेकर द्वारिका की साफ समझ है।  वो कहती हैं –' समाज मे लड़कियों के प्रति भेदभाव है लेकिन लड़के अच्छे होते हैं। मेरे भाई को ही लो, मेरे और उसके विचार नहीं मिलते, लेकिन भाई मुझे कहीं आने-जाने से मना नहीं करता है। '

' भाई को बाहर जाने की आज़ादी है एक तरह का एक्सपोजर है। उसकी मित्रा-मंडली है। उसके पास जानकारियाँ ज्यादा हैं। मेरे पास ये सोर्सेज़ नहीं हैं। जब मैं भाई के द्वारा जानकारियाँ बढ़ाना चाहती हूँ तो वह मेरे सवालों पर खीझ जाता है। '

हमारी एक साथी ने मज़ाक में एक सवाल उछला – ' शादी वाले तो बहुत आते होंगे ?'

'बहुत !'

हँसकर " आज़ादी किसे बुरी लगती है ?

Thursday, September 1, 2011

एक्टर बनने की पहली शर्त इंसान होना है

यह पुरानी पोस्ट है इसे मैंने अपने दूसरे  ब्लॉग बतकही के आर्काइव से निकाला है ।
क्या अभिनय किसी स्कूल में सिखाया जा सकता है ? अविनाश के इस सवाल ने सोने नहीं दिया | ५ - ६ साल बाद फिर इन बातों पर सोचने के लिए विवश कर दिया | अविनाश हमारे उन थियेटर के साथियों में से हैं जो शुरू से साथ रहे हैं | हर रिहर्सल पर समय से पहुंचना | कभी छोटी बड़ी जिम्मेदारी के लिए मना नहीं किया | आज हम जो उस वक्त अगुआई कर रहे थे और ५ - ६ सालों से चुप लगाये बैठे है और अविनाश अब भी सवालों की आग धधकाए हुए है | यह बड़ी बात है | दोस्त, यह एक ऐसा सवाल है जिस पर लंबी चर्चा हो सकती है और होती भी आयी है | लेकिन यह सवाल मुर्गी और अंडे वाले सवाल की तरह अनुत्तरित ही रह जाता है | अभिनय का संस्कार हर इंसान में पैदाइशी रूप में होता है | इसके सबूत के तौर पर आप छोटे बच्चों को सूक्ष्मता से देखें जब वे अपने हमउम्रों के साथ खेल रहे होते हैं या फिर वे जब अकेले होते हैं और बैठ कर दिन भर में लोगों से हुई बातचीत को रिफ्लेक्ट करते हैं | उन संवादों को वे उन्ही चरित्रों की शैली में अभिनय पूर्ण तरीके से व्यक्त करते हैं | चाहे वह टीचर की डाँट हो या मम्मी की हिदायतें "मैगी खाना बुरी बात , दूध पीना अच्छी बात " ऐसे ही संवादों को बच्चे अकेले बैठे सैकड़ों बार दोहराते हैं | दरअसल इस सारी प्रक्रिया में वे भाषा सीख रहे होते हैं | अगर यह कहा जाये कि बचपन में नाटक भाषा सीखने का माध्यम होता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी | अभिनय भाषा सीखने में अपरिहार्य है | अभिनय के द्वारा ही ये बच्चे रिश्तों की परिभाषाओं को समझते हैं | उनके खेलों का विषय अकसर टीचर स्टूडेंट के रिश्ते , माता - पिता के रिश्ते या फिर शादी या मौत जैसी पास-पडौस में घटने वाली घटनाएँ होती हैं |
अब सवाल यह है कि अगर अभिनय जन्मजात है तो फिर अकादमियों और स्कूलों की क्या जरूरत है | दरअसल अपने सही माने में दोनों ही अपनी महत्व खो चुके हैं फिर चाहे वे अभिनय के स्कूल हो या औपचारिक शिक्षा देने वाले स्कूल | आज वर्तमान शिक्षा व्यवस्थ से निकलने वाला विद्यार्थी भारत - अमेरिका के सम्बन्धों पर तो विश्लेष्णात्मक सुझाव दे सकता है लेकिन उसे यह बिलकुल समझ में नहीं आता कि उसे उपने माता - पिता या पत्नी के रिश्तों को कैसे संभालना है | हर बार 95 प्रतिशत अंक लेने वाले विद्यार्थी के जब 90 प्रतिशत मार्क्स आते हैं तो वह आत्म हत्या कर लेता है | तो बताओ क्या शिक्षा हो रही है ? शिक्षा जिंदगी की यथार्थ चुनौतियों का सामना करने में कोई मदद नहीं करती है | केवल यह व्यवस्था कुछ अटकलबाजियां सिखा देती जिसके द्वारा हजारों को पीछे धकेल कर कोई जना नौकरी पा जाता है | अभिनय स्कूल भी ठीक इसी तरह विद्यार्थी को सहयोगी कलाओं और और बाहरी नजर आने वाले मंच शिल्पों से भली भांति परिचित कराते हैं जो एक तरह से जरूरी हो सकते हैं | स्कूल हमें अभी तक जो संचित ज्ञान है उससे साक्षात्कार कराते हैं | लेकिन अभिनय के सूखे को खत्म करने के लिए कोई बाह्य उपक्रम काम नहीं आता है | जैसे व्याकरण पढ़ कर कोई भाषा नहीं सीख सकता वैसे ही स्कूल में अभिनय सिद्धांत पढ़ कर कोई अच्छा अभिनेता नहीं बन सकता है | अभिनय की यात्रा अंदर की यात्रा है | यह दूसरे के सुख दुःख से स्वानुभूति के स्तर पर अपने सुख दुःख को मिला कर एकात्म होने की अवस्था है | इसमें कोई बाह्य आडम्बर काम नहीं आता | यह तो खुद के अनुभवों के जमाखर्च विश्लेषण करने से ही संभव है | जो यह कर सकता है वही सहृदय बन सकता है | सहृदय बने बिना कोई अभिनेता नहीं बन सकता है | और सहृदय बनने के लिए वही जद्दोजहद चाहिए जो एक इंसान बनने के लिए होती है |  आज नजर यह आ रहा है कि इंसान बनाना किसी भी स्कूल के एजेंडा में नहीं है | एक्टर बनने की पहली शर्त इंसान होना है चाहे वह स्कूल के बाहर बने या भीतर | जिस दिन इंसान पैदा करना हर स्कूल के एजेंडा में शामिल होगा और उस और कोशिश की जायेगी तब नसीरुद्दीन, ओम पुरी  और अनुपम सरीखे लोग एन.एस.डी. या एफ.टी.आई. से नहीं किसी आम सरकारी स्कूल से निकलेंगे |
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

दलीप वैरागी 
09928986983 
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