Monday, April 2, 2018

दूसरे के जूते में पैर रख के देखो


27 मार्च 2018 को विश्व रंगमंच दिवस पर रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा  "क्षेत्रीय संस्कृतियों के उत्थान में रंगमंच का योगदान" विषय पर आयोजित सेमिनार में यह पर्चा मेरे द्वारा पढ़ा गया। 

"क्षेत्रीय संस्कृतियों के योगदान में रंगमंच का योगदान" इस कथन के इम्प्लिकेशन क्या हैं? एक रंगकर्मी होने के नाते मेरा यह धर्म है कि उन्हें पहचान कर बात आगे बढ़ाई जाए। एक मान्यता तो यह है कि है हम सब क्षेत्रीय संस्कृतियों को वैल्यू करते हैं। यह बात बिल्कुल सही भी है। यदि यह सही है भी और होना भी चाहिए, परंतु सही होने के साथ-साथ इसका एक सियाह पक्ष भी है जो या तो हमें दिखाई नहीं देता या फिर हम उससे साक्षात्कार करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। जब क्षेत्रीयता के इस अधूरे पक्ष को लेकर हम आगे बढ़ते हैं तो फिर तो हमारे सामनेमराठा-मानुष सरीखी इसकी चरम अभिव्यक्ति का विस्फोट होता है। जब यह विस्फोट होता है तो राजस्थान में विभाजन के वक्त आए पुरुषार्थी सिंधी-पंजाबी अपने ही मुल्क में शरणार्थी कहलाते हैं और उनको खुद के पुरुषार्थ को उदाहरण बनाने में आधी से ज्यादा सदी लग जाती है। केवल अपने श्रम की सामर्थ्य साथ लिए आजीविका की तलाश में आया कोई भी पूर्वी भारतीय जब राजस्थान आता है और कैसेबिहारीकी जातिवाचक संज्ञा  को प्राप्त करता है। जब यह तथाकथितबिहारीजब लुधियाणा या जालन्धर के किसी स्टेशन  पर उतरता है तोभईयाकी संज्ञा पता है। जब उसे इस संज्ञा या विशेषण से संबोधित किया जाता है तो उसकी ध्वनि को नहीं बोलने वाले के चेहरे को पढ़ें तो जो चाक्षुष बिम्ब हमारे मानस पटल पर बनता है, वह हमारी तथाकथित क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास की अवधारणा की कलाई खोल देता है। हमने किस तरह की क्षेत्रीय संस्कृति की पहचान विकसित की है जो किसी अन्य सांस्कृतिक पहचान के साथ सहअस्तित्व को बर्दाश्त नहीं कर सकती?
इस तरह का क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास जल्दी ही राजनैतिक नारों से  खाद पानी प्राप्त कर लेता है और देश की अखंडता के समक्ष चुनौती बन कर खड़ा हो जाता है। फलतः बिहार से आया ऑटो चालक मुंबई में अपनी पूर्वी मिश्रित अनगढ़ मराठी बोलते हुए भी मुंबई से बाहर लतियाया जाता है। उत्तर पूर्व से आए हुए विद्यार्थियों पर राजधानी में ही हमले होते हैं। ये क्षेत्रीयता की कौनसी संस्कृति हमने विकसित कर ली है? क्या इस शब्दावली को और गहरे से समझे जाने की जरूरत हैं। क्या क्षेत्रीय सांस्कृतिक विकास की क्या कोई सार्वभौमिक अवधारणा है भी क्या? क्या इस तरह के सांस्कृतिक विकास का चरम बिन्दु सांस्कृतिक श्रेष्ठता की मनोग्रन्थि में परिणत तो नहीं हो जाता! यह सवाल बेचैनी पैदा करता है।
कहीं अब तक के विमर्श में आपने मुझे एक यूनिफ़ोर्मिक कल्चर का पक्षधर तो नहीं समझ लिया। जी नहीं मैं इन दोनों एक्सट्रीम छोरों पे तो नहीं हो सकता, यदि हो भी तो इन दोनों के कहीं दरम्यान। हम सब जानते हैं कि भारत की संस्कृति बहुलतावादी है। यहाँ कई स्तर की विविधता है। इस वैविध्य के पीछे निस्संदेह भारत का बहुलता  भरा प्राकृतिक भूगोल है। इस भूगोल ने छोटे-छोटे अंचलों में अपनी-अपनी जीवन शैलियों और जीवन दर्शनों को पनपने में मदद की। भूगोल की चुनौतियों के पार जाने की फितरत इंसान की हमेशा रही है। बह भूगोल की बाधाओं को पार करके दूसरे लोगों से इंटरेक्ट करता रहा है। इसके साथ ही अपनी स्थानीय पहचान को लेकर असुरक्षा बोध की बेचैनी भी पाले रहा है। वह अपने दायरे बनाता भी रहा है कई बार दायरों से बाहर झाँकता भी रहा है। अपने दायरों का अतिक्रमण, इंसान के स्वभाव का यही पहलू उसे वैश्विक मानव भी बनाता रहा है। भारतीय इंसान के चरित्र का यही बिन्दु जहां उसे स्थानीयता के प्रति अनुराग के साथ भारतीयता का भाव भी देता है जो कभी अपने पूर्ण उद्दात  रूप में “वसुधैव कुटुम्बकम्व की अभिव्यक्ति कर बैठता है।  आज मनुष्य ने विज्ञान व तकनीक में इतनी तरक्की कर ली है कि उसने मरुस्थल, पर्वत, जल और अब अन्तरिक्ष इत्यादि भौतिक भूगोल की बाधाओं पर जीत हासिल कर ली है। स्थूल चुनौती हट चुकी है। अब इंसान ने भौतिक भूगोल की बाधाओं के स्थान पर वैचारिक संकीर्णताओं के कृत्रिम भूगोल के पहाड़ खड़े कर लिए हैं जो संस्कृतियों में वैमनस्य के संकट पैदा कर रहे हैं। यह संकट कृत्रिम है। तो फिर रास्ता क्या है?
दूसरे के जूते में पैर रख कर देखो।
एक मात्र रास्ता है रंगमंच, जो सर्वसुलभ भी है। रंगमंच कभी किसी एक क्षेत्रीय संस्कृति को लेकर नहीं चल सकता। रंगकर्म की अपनी ही एक संस्कृति है। इस संस्कृति के मूल्यबोध वैश्विक हैं, सार्वभौमिक हैं। इस मूल्य का प्रस्थान बिन्दु है इंसानियत। जिसके केंद्र में इंसान है। वह इंसान जो एक ही समय में सबसे अलग अद्वितीय भी है और सबके जैसा भी। इंसानियत के ये मानी देशकाल की सीमाओं से बाधित नहीं होते।
दरअसल रंगमंच किसी एक क्षेत्रीय संस्कृति को लेकर आगे नहीं बढ़ता है। दरअसल वह अपनी संस्कृति के उन सार्वभौमिक मूल्यों की स्थापना करता चलता है। जिसका केंद्र बिन्दु इंसान है और उसकी इंसानियत। इंसानियत को समझने का एक ही नुक्ता है और वह रंगमंच के पास है - "दूसरे के जूते में पैर रख कर देखो।" जब तक आप किसी भी स्थिति को दूसरे अर्थात विरोधी के दृष्टिकोण से नहीं देखेंगे तब तक आप न दूसरे इंसान को समझ सकेगें और न इंसानियत को। नाटक तो दूसरे के दृष्टिकोण से देखने से भी दो कदम आगे जाकर दूसरे की जिंदगियाँ जीकर देखने के अवसर देता है। दूसरे के हर्ष-विषाद को स्वयं के स्तर पर भोगने के मौके देता है।
मुख़तसर में कहे तो नाटक किसी संस्कृति के उत्थान में योगदान देता है या नहीं पर इतना अवश्य करता है कि वह अपने से अलग दूसरे की संस्कृति को समझने के अवसर, दृष्टि देता है व अपने से भिन्न का अहतराम करने का जज्बा देता है। एक दूसरी बात यह कि नाटक देखने से संस्कृतियों की समझ तो आ सकती है लेकिन भिन्न को समझ कर उसका सम्मान करने या अंगीकार करने का सामाजिक स्वीकार तो नाटक में डूबने से आएगा। जब नाटक का प्रदर्शन होता है तब, दर्शकों पर इसकी फुहार मात्र ही पड़ती है। सागर में गौते तो रंगकर्मी ही लगाता है। वैसे रंगकर्मियों में भी ऐसे कई हैं जो बरसाती पहन कर पानी में उतरते हैं। हममें से भी अधिकतर अपनी पकी हुई उम्र में रंगकर्मी बने हैं। इसलिए अक्ल दाढ़ देर से उगी है या उग रही है।  हममें से कितने हैं जिन्हें बचपन से ही इसी प्रक्रिया में ढाला गया था? मेरा मानना है कि यदि अपने से भिन्न की समझ, सम्मान या स्वीकार का जो सर्वभौमिक सांस्कृतिक मूल्य है वह तभी स्थापित होगा जब नाटक को प्रारम्भिक शिक्षा से जोड़ा जाएगा। यही मूल्य क्षेत्रीय समुदायों की पहचानों को सम्मान व स्वीकार प्रदान करेगा। ये मूल्य किताबी पाठों के कोरे सुभाषितों "अनेकता में एकता भारत की विशेषता" की तोता रटंत प्रक्रियाओं से नहीं आएगा। बल्कि इसे खोलकर इसके निहितार्थ समझकर ज्ञान आधारित व्यवहार करने के जीवंत अभ्यास देने होंगे। जीवंत अभ्यास देने का माध्यम रंगमंच से बेहतर और कोई नहीं हो सकता है।
मुझे आश्चर्य होता है कि नाटक शिक्षा के लिए जितना जरूरी है वह उतना ही शिक्षा व्यवस्था से बहिष्कृत है। यह उस देश में हो रहा है जिस देश में नाट्यशास्त्र जैसा ग्रंथ लिखा गया हो। नाट्यशास्त्र के पहले ही अध्याय में इसके रचयिता ने इसके उद्देश्यों में स्पष्ट कर दिया है कि इसका प्रमुख हेतु शिक्षा है। उम्मीद है कि इस गोष्ठी में शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़े लोग भी मौजूद हों। मैं पूछता हूँ कि आपमें से कितनों ने नाट्यशास्त्र को शिक्षाशास्त्र के रूप में पढ़ाया या देखा?  नाट्यशास्त्र शिक्षा शास्त्र के रूप में पढ़ाना तो दूर आज भी नाटक स्कूल में सह-शैक्षणिक गतिविधि के तौर पर ही सिमटा हुआ है। आज भी शिक्षा व्यवस्था में शिखर पर बैठे लोग नाटक को टूल ऑफ पेडागोजी मानने को ही तैयार नहीं। मैं बांसवाड़ा में आदिवासी लड़कियों के लिए संचालित एक सरकारी स्कूल में बच्चियों व शिक्षिकाओं के साथ नाटक की कार्यशाला कर रहा था। उस कार्यशाला में हम यह प्रयोग कर रहे थे कि कैसे नाटक को दैनिक शिक्षण का तरीका बनाया जाए। दुर्योग से शिक्षा विभाग के स्टेट ऑफिस से एक अफसर स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे। स्टाफ को एक घंटा बैठा के डांटते रहे कि आप तीन दिन से तथाकथित पढ़ाई लिखाई बंद करके केवल नाटक करवा रहे हैं। जब महानुभाव को यह बताया गया कि यह जो भी हो रहा है सरकार के साथ MOU के तहत हो रहा है और जो हो रहा है आपको उसकी मुख़तसर जानकारी व समझ भी होनी चाहिए।  

रंगकर्मी और शिक्षक अलग-अलग गृह के निवासी हैं
शिक्षा में नाटक के न होने की विडम्बना भी यही है। रंगकर्मी शिक्षक या शिक्षाविद नहीं और शिक्षक रंगकर्मी नहीं है। दोनों में आदान-प्रदान भी नहीं है। जब स्कूल में वार्षिक उत्सव होता है तब चार दिन के लिए रंगकर्मी को बुलाया जाता है। टीचर अपनी क्लास रंगकर्मी को सोंप कर दूसरे कामों में लग जाता है। जब कभी संयोग से कोई रंगकर्मी टीचर बन जाता है तो वह अपने “टीचर” व “रंगकर्मी” को प्रेक्टिस में तो रखता है लेकिन जुदा-जुदा। जब टीचिंग करता है तो अपने रंग कर्मी को बाहर जूते की तरह खोल आता है। जब बच्चों को नाटक करवाता है तब अपने शिक्षक को कोट की तरह कुर्सी पर टाँग आता है।
यह काम तभी हो सकता है जब रंगकर्मी व शिक्षक फुर्सत निकाल कर साथ बैठेंगे। साझा शैक्षिक नियोजन करेंगे। जब रंगकर्मी नाट्य प्रक्रिया शुरू करे तो शिक्षक प्रक्रिया का अवलोकन करे कि बच्चों में ऐसे कौनसे व्यवहारगत बदलाव अनपेक्षित रूप से हो रहे हैं, जिनको शिक्षक अपनी शैक्षणिक प्रक्रियाओं में देखना चाहता है। उसके उलट, जब शिक्षक अपना शिक्षण करे तो रंगकर्मी शैक्षिक प्रक्रिया को देखे कि उन अवधारणा को समझने में बच्चों को कहाँ मुश्किल आ रही है, इन्हें किन नाट्य प्रक्रियाओं से आसानी से बच्चे समझ सकेंगे।
ये प्रयोग किसी स्कूल में शुरुआती तौर पर कर पाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि इस तरह के प्रयोग में गिजुभाई को भी कम मुश्किले नहीं आई थीं। वही मुश्किलें जिनका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूँ। यह काम करने का स्पेस, मौका और स्वतन्त्रता जितनी शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालयों में हो सकती है उतनी कहीं नहीं। ये संस्थाएं प्री-सर्विस व पोस्ट सर्विस शिक्षक के काम को प्रभावित करती है।  इसलिए यह काम को शुरू करने का सबसे बढ़िया मंच ये संस्थाएं ही हो सकती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ऐसा करेगा हमें यह उम्मीद जल्दी ही छोड़ देनी चाहिए। उसके तो राष्ट्रीय स्वरूप पर भी प्रश्न चिह्न लगते रहे हैं। उसने एक अलग ही तरह की संस्कृति विकसित की है। उसपर चर्चा विषयांतर हो जाएगा। नाटक शिक्षाशास्त्र हो सकता है शुरू में मुझे भी यह विचार किताबी लगता था लेकिन जब-बच्चों व शिक्षकों के साथ काम करते हुए इसमें डूबा तो वास्तविक अनुभव व आनंद महसूस किया।   

एक अनुभव दूसरे को समझना का
जिस कार्यशाला की बात मैं कर रहा था,  उसके अंतिम दिन ड्रेस रिहर्सल के वक़्त जब हम लड़कियों से मिले, सब के बीच तीन-चार लड़कियाँ टोपियाँ (स्कल कैप) पहन कर बैठी हुई थीं। ये मौलवी की भूमिकाएँ निभा रहीं थीं। हमारा स्वाभाविक सा सवाल था, ‘‘अरे वाह! ये कहाँ से लीं?‘‘ ‘‘हमने खुद सिली हैं।” ‘‘किसने सिली हैं?” इसके जवाब में मुझे उम्मीद थी कि मेहरून, हसीना, हिना या शहनाज़ का नाम आएगा, लेकिन, लड़कियों ने समवेत स्वर में कहा, ‘‘सर, सुनीता ने सिली हैं, ये सारी टोपियाँ।अब हमारे लिए अटकलें लगाने के लिए बहुत कुछ था। क्या सुनीता टोपियाँ सिल सकती है, क्या सुनीता पहले से टोपियाँ सिलती रही है? या फिर नाटक बनाने की प्रक्रिया ने सुनीता को मजबूर कर दिया और उसने अपने आप उन्हें सिल दिया। दरअसल, इस दृश्य को इस तरह से भी होता हुआ देखा जा सकता है-सुनीता विद्यालय में सीखे अपने सिलाई कौशल से उत्साहित होकर मेहरून, हसीना, शहनाज़ व हिना से मिली होगी। जिस चरित्र के लिए टोपी सिली गई, उस पर बात हुई होगी, उससे परे मज़हबों पर भी बात हुई होगी। और, टोपी सिलते-सिलते कितने मज़हबी फ़ासलों की इन लड़कियों ने तुरपाई की होगी। कितने ही रिश्तों को रफ़ू किया होगा ? कौन कह सकता है, हमेशा साक्ष्यों की तलाश बेजा बात है। कुछ मामलों में हमें संभावनाओं को ध्यान में रख कर प्रक्रियाओं को छेड़ना भर है। कई बार परिणाम साक्षी होते हैं । साक्ष्य हमेशा हों, यह ज़रूरी तो नहीं।
नाटक के एक दृश्य में जब हसीना काठात अज़ान लगाती है तो उसकी सहपाठी दुर्गा मुसल्ला बिछा कर किसी मौलवी की तरह नमाज़ अदा करने लगती है। वही दुर्गा, जो एक दिन पहले नमाज़ के दृश्य में खुद को बहुत असहज महसूस कर रही थी ! लगभग इन्कार कर दिया था। फिर एक ही दिन में क्या हुआ? आज के दृश्य और कल की स्थिति के दरम्यान ज़रूर एक पूर्वरंग विद्यालय के आवासीय समय में रचा गया होगा। जो आपको दिखाई नहीं देखा आपके संतोष के लिए परिणाम है। यही स्थिति गणेश की आरती वाले दृश्य में थी। एक लड़की कोरस से निकल कर आगे आकर गणेश बनती है। बाकी लड़कियों का समवेत स्वर में आरती-गायन। नाटक का उद्देश्य हिन्दू या मुस्लिम धर्मों की उपासना पद्धतियों को देखना-सीखना नहीं हो सकता। बल्कि, नाटक दूसरे की जगह खुद को रख कर दूसरे के नज़रिए को समझना शुरु करता है, ताकि अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे के धर्म का अहतराम कर सकें। दरअसल, इन नाटक खेलती लड़कियों की शक्ल में हिंदुस्तान के सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष मुस्तकबिल का ब्लू प्रिंट दिखाई दे रहा है।

सारांश : सहज मार्ग नाटक 
निस्संदेह क्षेत्रिय संस्कृतियों के उत्थान के प्रयास होने चाहिए। और इसके लिए रंगमंच बेहतर माध्यम है। क्योंकि यह एक्शन थियरि – ज्ञान, भावना व कर्म तीनों को साथ लेकर चलता है। क्योंकि क्षेत्रीय संस्कृतियों का उन्नयन यदि मस्तिष्क की खिड़कियां खोलकर नहीं हुआ तो हम पूरी दुनिया में एक ऐसी जमात तैयार कर देंगे जो इतनी असहिष्णु हो जाएगी, परिणामस्वरूप कभी बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएं गिराएगी, लेनिन या अंबेडकर की मूर्तियों  को उखाड़ेंगी, फिल्मों के पोस्टर फ़ाड़ेंगी, पेंटरों को और लेखकों को निर्वासित करवाएगी और अंततः गोली मारकर खामोश करने की कोशिश करेगी। इसकी सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह है कि शिक्षा प्रक्रिया ज़िंदगी से आइसोलेशन में चल रही है। बच्चे विचारों को सूचनाओं की तरह ग्रहण कर रहे हैं। वैचारिक प्रक्रिया में ज्ञान का निर्माण नहीं कर रहे हैं। विरोधी विचार की कद्र करने के अभ्यास देने अब बंद कर दिए गए हैं। क्या यही थी इंडियन इंटेक्चुअल ट्रेडिशन? वैदिक शास्त्रार्थ को ही लें तो अपना विचार को प्रतिष्ठित करने से पहले विरोधी के विचार को वक्ता द्वारा पहले स्थापित करता था फिर उसकी सीमाओं पर बात होती थी तत्पश्चात अपने पक्ष की बात की जाती थी।
ये सभी ज़िंदगी की यथार्थ समस्याएँ हैं इनके हल ज़िंदगी के रास्ते पर चल कर ही निकाले जा सकते हैं। सिर्फ एक ही माध्यम है जो कक्षा में ज़िंदगी को संपूर्णता में उद्घाटित कर दे, वह नाटक है।  

दलीप वैरागी
मोबाइल:  9928986983
ई-मेल:  dalipvaragi@gmail.com



Wednesday, March 21, 2018

अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस : आओ, लोगों को नाटक का चस्का लगाएँ


अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस अगर जवाब है तो फिर सवाल क्या है?
आज इस मौके पर रंगकर्मियों को उस सवाल को तलाश कर पकड़ना चाहिए। हाथ लगने पर सबसे पहले खुद पर  ही दागना चाहिए। तब कहीं जाकर यह दिन मनाने या न मनाने की सार्थकता समझ में आएगी। मेरा जब सवाल से सामना हुआ। उससे उपजी बेचैनी में कुछ जांच पड़ताल की तो पता चला कि कोई International Theatre Institute (ITI) नाम का एक गैर सरकारी संगठन है, जिसने यह दिन 27 मार्च को मनाने की शुरुआत की थी। सबसे पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस 1961 में मनाया गया था। तब से ITI इस दिन को मनाने की अगुवाई व अह्वान हर वर्ष करती है। विश्व भर में इसके लगभग 90 से ज्यादा क्षेत्रीय केन्द्रों व अनगिनत रंग मंडलियों द्वारा आयोजन किए जाते हैं। ITI हर वर्ष नाटक की किसी प्रसिद्ध हस्ती द्वारा लिखित संदेश जारी करती है। गौरव की बात यह है कि इस वर्ष यह रंग-संदेश जारी करने वालों में भारत के  रंग निर्देशक राम गोपाल बजाज का नाम भी है।
ये तो इतिहास की बात हो गई। लेकिन सवाल तो वहीं वर्तमान में है कि अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस क्यों मनाया जाए ?
हम क्यों मनाएँ इस सवाल को चंद क्षणों के लिए होल्ड पे रखते हैं और पहले यह देखते हैं कि ITI क्या सोच कर इसे आधी से भी ज्यादा सदी से मानती चली आ रही है। ITI ने अपने उद्देश्य स्पष्ट कर रखे है -
·        दुनिया में जितने भी तरह का रंगकर्म हो रहा है उसे बढ़ावा देना।
·        रंगमंच की अहमियत लोगों को बताना।
·        सरकार व नीति निर्धारक रंगमंच की अहमियत को समझ कर इसकी मदद कर सकें, इसके मद्देनजर रंग मंडलियों को अपने काम बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने में सक्षम बनाना।  
·        नाट्यकर्म करने में आनंद महसूस करना।  तथा
·        इस आनंद को दूसरों के साथ साझा करना
ऊपर बताए गए बिन्दुओं की रोशनी में हम अपने आयोजनों को भी देख सकते हैं। हो सकता इनमें से कोई एक बिन्दु आपको हो। दो-तीन या सब भी हो सकते हैं। ये भी हो सकता है कि आपके इससे दो अधिक भी हों। लेकिन किसी भी आलोक में आत्मवलोकन अवश्य करें कि क्यों मानना है। मनाने की वजह और तरीका भी अपना खुद तय करें।  
तरीके से याद आया कि एक तरीका चल निकला है विचार-गोष्ठी वाला। इसके चल निकलने के पीछे हींग और फिटकरी वाली कहावत यदि पूरी नहीं तो थोड़ी तो जरूर लागू होती है।  यह सच कि इस तरीके में हींग और फिटकरी के इनपुट से तो बच जाते हैं लेकिन चौखा रंग भी तो नहीं चढ़ता। अब रंग के अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का कोई भी अर्थ लिया जा सकता है। सबको पता है कि गोष्ठी से रंग जमता नहीं, पर दिल है कि फिर भी मानता नहीं। गोष्ठी के लिए पचास जनों को बुलाओ, पंद्रह पहुंचेंगे, पाँच बोलेंगे बाकी चाहे तो सो लेंगे। इसके आउटकम के रूप में भी एक कहावत है जिसका सारांश आखिर तीन पात ही होता है। अब आप कहेंगे कि कहावत की पूरी अभिव्यक्ति क्यों नहीं की जा रही है। वह इसलिए कि आपको तो पता है कि अभिव्यक्ति के खतरे बहुत हैं आजकल। आप पर तो भरोसा किया जा सकता है , लेकिन ढाक तो बुरा मान सकता है कि भाई तीन पात होने में उसका क्या कसूर!  
यह सवाल भी देखो कितना बहरूपिया है,  हमें यहाँ उलझा खुद कपड़े बदल कर आ गया। खड़ा है मेरे बर अक्स और पूछ रहा है कि किसको मानना चाहिए अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस? अरे भाई, जो मानना चाहे उसे मानना चाहिए। जिसका प्रदर्शन कला या नाट्यकला की ताकत में यकीन है, जिसका मनुष्यता में यकीन है। आप कहीं के भी हों कोई भी हों। यदि आप गाते हैं तो आज कोई नई तान छेड़िए। इंकलाबी हैं तो फेफड़ों में पूरी हवा भर कर जय रंगकर्म का नारा बुलंद कीजिए। स्कूल में कभी ड्रामा किया है तो अब शहर में भी कीजिए। किसी नाटक मंडली को जानते हैं तो उसे अपने शहर में भी नाटक करने को बुला लाइए। शहर में नाटक है तो देखने जाइए, साथ में किसी और को भी ले जाइए। चार पैसे हों और हाथ खुला हो तो रंगकर्म की तंगी दूर कर आइए। पढ़ते लिखते हैं तो आज कोई दास्ताँ मित्र मंडली में बैठ कर भावपूर्ण तरीके से सुनाइए। अभी तक देखने नहीं गए तो नाटक देख कर आइए। पसंद आए तो सराहिए नहीं तो नुक्ताचीनी ही कर आइए। यदि रंगकर्मी हो हजार तरीके से मनाइए।
यदि अकेले हो तो दो हो जाएँ। किसी तीसरे को भी ढूंढ लाएँ। हर नए को नाटक का चस्का लगाएँ। फिर भी कुछ समझ में न आए तो गोष्ठी करके ही सही लेकिन मनाएँ। आइये अंतरराष्ट्रीय रंगमंच दिवस मनाएँ। इसे सिर्फ रंगकर्मियों का दिवस न बनाएँ। अन्यथा रंगकर्मी इतिहास की विलुप्त प्रजातियों में शुमार होगी और प्रकारांतर से इंसानियत भी।
क्योंकि इंसानियत के साथ गलबहियाँ करते हुए अभिनय कला आई है, यह गई तो इंसानियत की कोई क्या जाने?

Tuesday, March 13, 2018

जीवन कौशल शिक्षा क्या है


शिक्षा आज इंसानी जरूरतों में सर्वोपरि है। इसी सोच के तहत इसे इंसान के बुनियादी अधिकारों में शुमार किया गया है। क्योंकि इंसान के रोज़मर्रा के सरोकार भोजन, सेहत, सौंदर्यबोध व व्यवहार  को शिक्षा गहरे से प्रभावित करती है या कर सकती है। इसलिए गुणवत्ता शिक्षा का एक पर्याय यह भी माना गया है कि इंसान ज्ञान आधारित व्यवहार करे। इस शब्दावली में दोनों ही शब्द काबिले गौर हैं। और सीधे ही पता चलता है कि कार्य दो स्तर पर अपेक्षित है।
इसी सन्दर्भ में जब हम मौजूदा शिक्षा प्रक्रिया को देखते हैं तो एक विडंबना साफ नज़र आती है कहीं ज्ञान का बोलबाला है तो कहीं केवल व्यवहार की उपदेशमाला है। ज्ञान को लेकर दृष्टिकोण भी सूचनाओं को किसी भांति रट लेने न कि उसके निर्माण अथवा उसकी निर्मिति के मनोवैज्ञानिक अप्रोच के तहत ग्रहण से है।
ज्ञान और व्यवहार के मध्य गहरी खाई  है। वहीं मनुष्य के समक्ष समस्याएं अपने वास्तविक रूप में वर्तमान हैं और ज्ञान का आभासी स्वरुप है, जो अजस्र (लगातार) भविष्योन्मुखी पर्वतारोहण सरीखा है। जब शिक्षा वर्तमान समस्याओं को अनदेखी करके आगे बढ़ती है, तो या तो उस प्रक्रिया से विश्वास और आनंद समाप्त होता है और टूटन आती है अथवा हम शिक्षा के संकीर्ण हेतु तलाश लेते हैं और उनके साथ आगे बढ़ जाते हैं। दोनों ही स्थितियों में जीवन के वास्तविक संघर्ष शिक्षा की जद से छूट जाते हैं।
हम पुनः शिक्षा के उसी सूत्र को पकड़ने की कोशिश करते हैं - शिक्षा दरअस्ल ज्ञान आधारित व्यवहार है। यह शब्दावली इंसानी फ़ितरत के दो अलग-अलग छोर पकड़ कर खड़ी है। इसके स्वरुप को समझना जितना आसान हो सकता है इनका परस्पर रूपांतरण एक बेहद जटिल मनोदैहिक (psychosomatic) प्रक्रिया है। इस मनोदैहिक सम्बन्ध को समझ कर उसे शिक्षाशास्त्र में ढालना ही जीवन कौशल शिक्षा का उपक्रम है।
कौशल और उसका निर्माण
औपचारिक शैक्षणिक प्रक्रियाओं में और कभी- कभी जीवन कौशल शिक्षा की प्रक्रियाओं में एक गफलत होने की सम्भावना रहती है कि वह कौशल में तबदीली तक न पहुँच कर मुद्दे की समझ तक ही न रह जाए। प्राय: मूल्यांकन प्रक्रिया में मुद्दे तक आसानी से पहुँच जाती है, व्यवहार तक पहुँचने के लिए फुर्सत वर्तमान मूल्यांकन प्रक्रियाओं में शायद नहीं है, फलस्वरूप प्रक्रिया को मुकम्मल समझ लिया जा सकता है।
कौशल एक मायने में इंसानी सक्रियता का बाईप्रोडक्ट होता है। यह इंसान की चेतन सक्रियता से प्रारम्भ होता है तथा उसकी गतियों-क्रियाओं के अभ्यास के नैरन्तर्य के पश्चात आदतों के रूप में अवचेतन में डुबकी लगा जाते हैं। आदतें मनुष्य के चेतन प्रयासों के पश्चात वे परिष्कृत क्रियाकलाप हैं जिन पर चेतना के नियंत्रण की जरुरत नहीं होती है। इसलिए वे अवचेतन को हस्तगत होते हैं। कौशल वह नियंत्रण है जो इंसान की आदतों या उनके अद्भुत समिश्रणों का प्रयोग किसी कार्य को साधने के लिए करता है। और यह नियंत्रण चेतना से ही किया जाता है। इस तरह कौशल इंसान के चेतन मन का फंक्शन है न कि अचेतन का। इंसान के व्यवहार में कौशल के स्तर पर पैठ के लिए जरूरी है कि उसकी सक्रियता के उत्स व प्रेरण को भी समझा जाए।
ये रूपांतरण जटिल है तो फैसियानेटिंग भी है। यह हर प्रकार के कौशल के लिए सामान है।
बुनियादी जीवन कौशल क्या हैं?
यह निर्धारित करने का विषय स्वयं व्यक्ति का जीवन ही है। इसके आगे यह भी तय करना होगा की जीवन की कौनसी समस्याएं हैं जो उसे गहरे प्रभावित करती हैं। शायद यह भी देखना होगा कि क्या इन समस्याओं में कोई पैटर्न है। ऐसी कौनसी समस्याएं हैं जो उम्र, देशकाल, वर्ग के हिसाब से कॉमन हैं। क्या इनको हल करने के लिए कॉमन संक्रियाएं निर्धारित हो सकती हैं। यदि हाँ, कहीं ये मूलभूत संक्रियाएँ बुनियादी जीवन कौशल तो नहीं। जब हम ऐसे कौशल को पाते और देखते हैं जो बहुत बुनियादी किस्म का हो तो वह निसंदेह बाह्य की बनिस्पत आभ्यंतरिक ही होते हैं।
इंसान अपने जीवन में ज्यादातर जिन समस्याओं से दो चार होता है वे उसके अन्तर्वैयक्तिक संबंधो से जुडी होती है। इन समस्याओं को बेहतर समझने के लिए सोचने समझने के आधारभूत कौशल आधारभूत है। यूँ तो इंसान की विचार प्रक्रिया उसकी सहजवृत्ति है। वह बाह्य जगत को देखकर उसे विचारों में निरंतर रूपांतरित करता रहता है। सोचने समझने को कौशल जिसे रिफ्लेक्टिव स्किल की संज्ञा दी जाती है, वह इंसान की इस विचार प्रक्रिया को सौद्देश्य नियंत्रित व नियोजित करती है। यह एक व्यवस्थित वैचारिक परिघटना है, जिसे इंसान प्रयास व अभ्यास से अर्जित करता है। यह कौशल किसी नए अनुभव को अपने पूर्व अनुभवों व ज्ञान से जोड़कर समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है। चूँकि इन अन्तर्व्यक्तिक संबंधो से व्यक्ति स्वयं भी जुड़ा होता है। इसलिए यह अपेक्षा रहती है कि वह तटस्थ होकर भावनाओं से निरपेक्ष स्थिति पर विचार करे।
इंसानी रिश्तों की भी बड़ी द्वंद्वात्मक स्थिति है। इनमें समस्याओं का जाला भी है तो साथ में सहयोग का ताना बाना भी है। इन सहयोग के सूत्रों को पकड़कर रिश्तों में सद्भवनापूर्वक सामंजस्य बैठना वह सामर्थ्य है जिसे प्रभावी सम्प्रेषण कौशल से ही हासिल किया जा सकता है।
सोचना समझना
सहयोग लेना व करना तथा
सद्भावपूर्वक रिश्तों के दरम्यान सामंजस्य बनाना।
ये तीन बुनियादी कौशल हैं जो निःसंदेह इंसान को सामर्थ्यवान बनाते है जिंदगी की राहों पर चलने के लिए।





Thursday, May 18, 2017

ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 : उसके इंतज़ार में उर्फ आखिर तक सुर बदल गया

ग्रीष्म नाट्य उत्सव 2017 अभी समाप्त होकर चुका है। उत्सव की समीक्षा लिखी जानी है। हर इवेंट की समीक्षा लिखे जाने से पहले मेरे सामने यही बुनियादी सवाल होता है कि समीक्षा क्यो लिखी जाए। समीक्षा यदि जवाब है तो फिर वह सवाल क्या है? मैं सवाल की तलाश में लग जाता हूँ। जवाब तो सामने है, सवाल तक पहुँच की कोशिश ही मेरे लिए समीक्षा है।  इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव में तीन दिनों में (12-14 मई 2017) चार रंग प्रस्तुतियाँ हुईं
·        मैरिज प्रपोज़ल
·        आधी रात के बाद
·        मरणोपरांत
·        उसके इंतज़ार में
पहले दिन की समीक्षा पूर्व में आ चुकी है उसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है।
नाटक “आधी रात के बाद” शंकर शेष का लिखा हुआ नाटक है, जिसे जयपुर के युवा रंगकर्मी शिव सिंह पलवात ने निर्देशित किया। इस नाटक में दो मुख्य पात्र है एक चोर और जज। चोर चोरी से इतर उद्देश्य के तहत एक जज के घर रात को घुसता है और जज से कहता है कि वे पुलिस को फोन करे ताकि वह जेल जा सके। यह नाटक सहज ही समय की उस विडम्बना को भी संप्रेषित कर जाता है कि व्यक्ति समाज से अधिक जेल में सुरक्षित है। बेहद कसे हुए कथोपकथन विधान  में यह नाटक कसावट के साथ आगे बढ़ता है शिव सिंह पलवात व योगेंद्र अगरवाल ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया। पार्श्व ध्वनियों का बहुत सुंदर प्रयोग किया। पृष्ठभूमि में घड़ी की टिकटिक समय की गतिशीलता को बखूबी प्रदर्शित कर रही थी। यदि बेचैनी तनाव के क्षणों में यह ध्वनि तीव्र होकर फिर धीरे होती तो और भी प्रभाव पैदा करती। सम्पूर्ण प्रभाव पैदा करने में यह नाटक पूर्णत: सफल रहा।
तीसरे दिन दो प्रस्तुतियाँ हुईं - सुरेन्द्र वर्मा द्वारा लिखित व अंकुश शर्मा द्वारा निर्देशित लघुनाटक “ मरणोपरांत” तथा प्रदीप कुमार द्वारा लिखित व देशराज मीना द्वारा निर्देशित नाटक “उसके इंतज़ार में”। मरणोपरांत दो पुरुषों की दास्तां है जो एक ही महिला को चाहते हैं। एक पति(अंकुश शर्मा) है तो दूसरा प्रेमी(कृश सारेश्वर) है । जैसा कि नाटक के नाम से ही स्पष्ट है कि महिला के मरणोपरांत पति को पता चलता है कि उसकी ज़िंदगी में कोई और पुरुष भी है। दोनों पुरुष मिलते हैं यद्यपि दोनों एक दूसरे को नाकाबिले बर्दाश्त हैं लेकिन वे एक ऐसे सूत्र से जुड़े हुए हैं जो अब नहीं है। आद्यंत यह नाटक दोनों पात्रों  के माध्यम से रिश्तों में आई रिक्तता को प्रदर्शित करता है। यहाँ दोनों के सवाल हैं। और सवाल के दो रेस्पोंस है एक पहला जवाब और दूसरा खामोशी। अंकुश शर्मा ने नाटक के पात्रों की ज़िंदगी की रिक्तता को पकड़ा और नाटक के संवादों के मध्य में जगह-जगह फैला दिया। इस नाटक  में सन्नाटे को रूपायित करने का बखूबी प्रयोग किया गया है। इस सन्नाटे को और गहरे रंग देने का काम किया मदन मोहन के संगीत ने। जहां वे नाटक में चंद क्षणो के लिए मंच पर सहयोगी भूमिका में दिखाई देते है वही वे ज्यादार समय बैक स्टेज में रहकर संवादों के दरम्यान पसरे सन्नाटे को अपने आलापों के माध्यम से गहरे अर्थ देते हैं।
तीसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति थी प्रदीप कुमार द्वारा लिखित व देशराज मीना द्वारा निर्देशित नाटक – “उसके इंतज़ार में”।  इस नाटक में प्रदीप कुमार ने स्वयं अभिनय भी किया। जब वे मंच पर आते हैं तो वे नाटक के संवादों के अतिरिक्त अपनी रंगकर्मियों और समसामयिक मुद्दों पर आशु टिप्पणियों से दर्शकों को अपने साथ बांध लेते हैं। ऐसा लगता है कि उनका मंच कवि नाटक में भी उनके अवैतनिक सहयोगी के रूप में आकार खड़ा हो जाता है। प्रदीप में गजब की संप्रेषणीयता है।
जहां कवि व अभिनेता के रूप में प्रदीप बेजोड़ हैं वहीं उनके नाटककार व निर्देशक से कुछ सवाल पूछा जाना जरूरी हो जाता है। ज्ञातव्य है कि “उसके इंतज़ार में” नाम से प्रदीप पहले भी एकल नाटक प्रस्तुत कर चुके हैं जिसके लिए उन्हे बहुत सराहना मिल चुकी है। इस बार इसे टीम के रूप में प्रस्तुत किया गया। नाटक दो दृश्यों में विभाजित है। वस्तत: ये दो दृश्य न होकर फॉर्म के स्तर पर दो नाटक दिखाई हैं देते हैं। जिन्हें एक नाटक में पिरोने का पूर्णतया विफल व निरर्थक प्रयास  किया गया था। दोनो के जोड़ने में इसका जोड़ ज्यादा मुखरित हो रहा है। इन दोनों नाटकों में एक ही समानता है कि दोनों का मूल कथ्य एक है।  लेकिन पूर्वार्द्ध  का काम उत्तरार्द्ध  के बिना और उत्तरार्द्ध का पूर्वार्द्ध के बिना चल सकता है। नाटक “उसका इंतज़ार... ” जब शुरू होता है तो मंच पर दो अभिनेता ऋषभ एवं हेमेन्द्र सिंह आते है और गज़ब संवाद अदायगी, गति व टाइमिंग से पूरे दृश्य में आखिर तक अपनी सशक्त उपस्थिति से दर्शकों को प्रभावित करते हैं। मंच पर अस्त अस्त व्यस्त सज्जा उनके अभिनय में सहयोग प्रदान करती है। पहले दृश्य के खत्म होने के पश्चात एक कौतूहल के साथ पूर्वानुमान था कि नाटक में आगे जाकर एक क्लाइमेक्स बनेगा और उस बिन्दु पर नाटक खत्म होगा। लेकिन दूसरे दृश्य में नाटक का सुर ही बदल जाता है। ऐसा लगता है कि मुखड़ा किसी राग में है और अंतरा दूसरे राग में । फॉर्म का घालमेल हो जाता है। पूरे मंच पर प्रदीप अतिव्यापित हो जाते हैं। पहले दृश्य के सशक्त चरित्र ओझल हो जाते हैं। या यूं कहे कि प्रदीप उन्हे सोख लेते हैं । वे पृष्ठभूमि के साय मात्र बनकर रह जाते हैं। देशराज इस नाटक के निर्देशक है। वे तार्किक रूप से इस नाटक में यह जस्टिफ़ाई नहीं कर पाते हैं कि जब उत्तरार्द्ध का दृश्य एकल है तो मंच पर उपरोक्त तीनों नाटकों के अभिनेताओं कों क्यू झोंक देते है। जबकि उनकी जरूरत नहीं थी। देशराज इस  नाट्य उत्सव के सशक्त अभिनेताओं कों मंच पर क्यूँ छितरा देते हैं। पृष्टभूमि के ये अभिनेता नाटक मे सहयोग करने की बनिस्पत नोइस ही क्रिएट कर रहे थे। उम्मीद है कि प्रदीप अपने नाटक के फॉर्म पर पुनर्विचार करेंगे। मुझे लगता है इसके पीछे प्रदीप जी के साथ एक जनरल फिनोमिना  भी है जो उनकी विवशता बन रहा है कि खुद के लिखे आलेखों पर ही काम करना। मुझे लगता है कि प्रदीप कुमार को इसे बदलना चाहिए और दूसरे लेखकों के आलेखों पर भी काम करना चाहिए।
देशराज की एक खूबी यह रही कि मंच विधान ऐसा रखा जो सभी नाटकों कों सपोर्ट करे। जाहीर है आलेखों के चयन में उनकी सूजबूझ रही होगी जो कि कबीले तारीफ है। तीसरे दिन तक देशराज मीना टिकटिया दर्शको की संख्या पहले दिन के अनुपात में बढ़ाने में कामयाब रहे। काश इसी अनुपात में टिकटिया रंगकर्मी भी बढ़ते। खैर, सभी कों बधाई जो इस आयोजन ने जुड़े, उन्हें भी जो नहीं जुड़े।

 -(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 


दलीप वैरागी 
09928986983 

Saturday, May 13, 2017

द मैरिज प्रोपोज़ल : अरण्य में कहकहे तलाशता एक हास्य





रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित “समर थियेटर फेस्टिवल” की प्रथम प्रस्तुति के रूप में दिनांक 12 मई 2017 को एंटोन चेखव द्वारा लिखित, देशराज मीना द्वारा रूपांतरित तथा जयपुर के धीरेन्द्र पाल सिंह द्वारा निर्देशित नाटक “द मैरिज प्रोपोज़ल” का मंचन किया गया। इस नाटक में धीरेन्द्र पाल, योगेन्द्र अगरवाल व विमला डागला ने अभिनय किया। इस नाटक की समीक्षा में बहुत सारी बाते हैं जो कही जा सकती हैं किन्तु बहुत सी ऐसी बाते हैं जो इस नाटक से बाहर हैं और कही जानी चाहिए। ये नाटक से सीधे जुड़ी न होते हुए भी नाटक को प्रभावित तो करती हैं। इसलिए उन्हें समीक्षा की जद में आना चाहिए।
नाटक के विषय में एक ही बात कह कर बात खत्म की जा सकती है कि यह नाटक दरअसल अरण्य में रचा गया एक हास्य है। दरअसल नाटक  में ह्यूमर तो  है लेकिन सामने से कोई कहकहा नहीं सुनाई देता। दरअसल खाली कुर्सियों से क़हक़हों की उम्मीद बेमानी है।  इस नाटक के कलाकारों के उत्साह के ग्राफ में उतना ही अंतर था जितना कि एक हाउसफुल औडिटोरियम और खाली कुर्सियों के समक्ष आनुपातिक रूप से होता है। रंगमंच एक जीवंत माध्यम है उसे मंच और दर्शक को अलग करके देखा नहीं जा सकता। कलाकार दर्शक से त्वरित रेस्पोंस की उम्मीद करता है। जब उसे वह नहीं मिलता तो उसके घुटनो से जान निकल जाती है। फिर वह तमाम नाटक में अपने कंधों पर ही अभिनय को ढोता रहता है। दर्शकों का यह तात्कालिक रेस्पोंस नकारात्मक व सकारात्मक दोनों होता है। जब यह नकारात्मक होता है तो वह कलाकार को और दम लगानेकी चुनौती देकर प्रोत्साहित करता है। जब यह सकारात्मक होता है तो अभिनेता में पंख लगा देता है। मुश्किल तब आती है जब यह फीडबैक आता ही नहीं। लगभग यही कल की प्रस्तुति में हुआ।  
बहुत बड़ी विडम्बना है कि शहर की लगभग साढ़े तीन लाख आबादी में से मुश्किल से 50 दर्शक नहीं जुट पाए। अलवर शहर में लगभग 30 नाट्य संस्थाओं से मुट्ठी भर प्रतिनिधि भी नहीं थे। अलवर थियेटर आर्टिस्ट एसोसिएशन के नाम से व्हटस एप्प पर संचालित ग्रुप में 103 रंगकर्मी (?) नामांकित हैं उनमे से कल के नाटक में उपस्थिति दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू  पाई। यह तब है जबकि इसी वाट्स एप्प समूह में इस इस ग्रीष्म नाट्य उत्सव की सूचना लगभग एक पखवाड़े से  रोज प्रसारित की जा रही है। यूं तो ग्रुप में सदस्यों की सक्रियता देखते बनती है। दिन भर मैसेज की इनबॉक्स में धारासार वर्षा होती है। अधिकारों, दायित्वों व आंदोलनों की बाते होती हैं। लेकिन जब भौतिक रूप से उपस्थिति की बात होती है तो वहाँ पर एक चुप्पी ही पहुँचती है। इस आभासी सक्रियता को पहचाना जाना चाहिए। आभासी सक्रियता किसी काम की नहीं हैं। अलवर में तीन-चार तरह के तरह के रंगकर्मी हैं।
·        पहले दर्जे में वे हैं जो लगातार नाटक कर रहे हैं।
·        दूसरे दर्जे में वे हैं जो प्रक्रिया में हैं लेकिन उनके नाटक मंच तक नहीं पहुँच रहे हैं।
·        तीसरी श्रेणी वे हैं जो सक्रिय नहीं हैं किन्तु नाटक देखने जरूर जाते हैं।
·        चौथे दर्जे में  वे हैं जो अतीत के स्मृतियों के जमाखर्च से अभी तक काम चला रहे हैं।
एक श्रेणी और है जो केवल वाट्स एप्प पर आभासी सक्रियता दर्शा रहे हैं। इस छद्म सक्रियता को पहचानना होगा।
इसी वाट्सएएप्पी सक्रियता से शहर में औडिटोरियम की मांग को लेकर आंदोलन चलाया जा रहा है। अजीब विडम्बना है कि औडिटोरियम की निशुल्क मांग को लेकर आंदोलन चलाया जाए और जब औडिटोरियम में कोई नाटक हो तो वहाँ नाटक देखने न जाया जाए। इससे यही निगमित होता है कि दरअसल रंगकर्मियों को औडिटोरियम की जरूरत ही नहीं? या फिर वे औडिटोरियम की मुफ्त में उपलब्धता के बाद ही नाटक करने या देखने जाएंगे! समूह में सभी बाते होती हैं लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि मैं नाटक देखने आ रहा हूँ या नहीं आ सकता...  नाटक के मंचन के पश्चात ग्रुप में तस्वीरें डाली गईं, अखबार की कतरन डाली गईं। 17 घंटे के बाद किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं है.... यह सायास या अनायास चुप्पी शंकित करती है कि कहीं हमारी सक्रियता आभासी तो नहीं। खैर, इस समर उत्सव में दो पहल मजबूती से हुई हैं –
·        नाटक को समय से शुरू करना
·        टिकट से नाटक दिखाना
यह नाटक समय पर शुरू कर दिया गया था। जो भी दर्शक आए उन्हे दिखाया गया। यह एक अच्छी पहल है। ये नए दर्शक निर्माण की और उठाया गया कदम है। जो दर्शक आए उनकी लिटरेसी हो गयी कि भविष्य की प्रस्तुतियों में टाइम का महत्व है।
इस बार नाटक का टिकट 50/- का रखा गया था। थियेटर एसोसिएशन के कलाकारों को 50% की छूट थी। इस छूट का लाभ नगण्य रूप से ही लिया जा सका। लेकिन प्रेक्षाग्रह में प्रविष्टि टिकट से थी यह बात महत्वपूर्ण है। शहर के रंगकर्मियों को भी अब मुफ्त की प्रवृति को बदल कर काउंटर से टिकट लेना सीखना चाहिए। पुराने व वरिष्ठ रंगकर्मियों को अब आमंत्रण पत्रों की घर पर प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्हे मीडिया से सूचना पाकर प्रेक्षागृह तक पहुँचने में अपना मान समझना चाहिए। घर-घर आमंत्रण पत्र देने में रंगकर्मी का बहुत समय, ऊर्जा व संसाधन जाया हो रहे हैं यह समझना चाहिए।
बहरहाल, आज शंकर शेष द्वारा लिखित व शिव सिंह पलवात द्वारा निर्देशित नाटक “आधी रात के बाद” का मंचन है। स्थान वही है – महावर औडिटोरियम समय ठीक 7.30 पीएम।
बड़ी संख्या में पहुँच कर ग्रीष्म नाट्य उत्सव का आनंद लें।
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दलीप वैरागी 
09928986983 


Friday, March 31, 2017

अलवर की एक शाम किस्सागोई के नाम - दलीप वैरागी

इस लेख को नाट्य समीक्षा न समझा जाए तो ही सही होगा। क्योंकि यह कहीं पर इतिहास है, कहीं पर इतिवृत, कहीं रिपोर्ट है, कहीं संस्मरण है, कहीं पर आत्मावलोकन है कहीं पर आत्मालोचन...  खैर...
27 मार्च 2017, विश्व रंगमंच दिवस के मौक़े पर अलवर में “कहानी रंगोत्सव” का सफलतापूर्वक आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम कई मायनों में सफल माना जा सकता है। इसमें पहला बिन्दु है – जिस प्रकार 4 अक्तूबर 2015 को रंग संस्कार थियेटर व उसी से सम्बद्ध देशराज मीना ने जो सिलसिला शुरू किया था व अनवरत चल रहा है। यदि मेरे स्मृति क्षीण नहीं हुई है तो इसकी शुरुआत एक दिवसीय हास्य नाट्य उत्सव के रूप में प्रताप औडिटोरियम में हुई थी। उस समय तीन नाटकों का प्रस्तुतीकरण हुआ, जिसमें एक मोलियर का नाटक बिच्छू, हरीशंकर परसाई का निठल्ले तथा तीसरा नाटक प्रदीप कुमार का “उसके इंतज़ार में था”। शुरू के दोनों नाटकों में  दिल्ली के रंगकर्मी मंच पर नज़र आए हालांकि प्रदीप कुमार भी अलवर से हैं लेकिन उन दिनों वे गुजरात प्रवास पर  थे। तब तमाम अच्छाइयों के बीच एक बात यह भी उठ रही थी कि स्थानीय प्रतिनिधित्व नहीं है।
इसकी दूसरी आवृत्ती  के रूप में 14 से 17 जनवरी 2016 को “अलवर नाट्य महोत्सव के रूप में हुई।” अलवर के दर्शकों को देशभर के जाने माने कलाकारों से विविधता भरे नाटकों का पाँच दिन तक फुल डोज़ मनोरंजन मिला। इसका तीसरा चरण 26 जनवरी 2017 एक दिवसीय नाट्य संध्या के रूप में आयोजित किया गया जिसमे दिल्ली और लखनऊ के समूहों ने हास्य नाटको का प्रदर्शन किया। यद्यपि मैं इस कार्यक्रम को नहीं देख पाया लेकिन देखने वालों ने बताया कि एक नाटक मे देशराज ने भी अभिनय किया था।

इस संक्षिप्त इतिहास का विवेचन इसलिए हो रहा है क्योंकि यह एक गति को दर्शाता है। यह गति मात्रा, आवृत्ती व गुणवत्ता की ओर उत्तरोत्तर बढ़ रही है। गुणवत्ता के आशय यहाँ  बहु आयामी हैं। एक आशय यह भी है कि इसकी प्रस्तुतियों ने एक  समन्वित प्रभाव छोड़ा है। दस साल के निर्वात को भरा है। प्रभाव को इस रूप में देखा जा सकता है। आज अलवर में अलग अलग रंग मंडलियों में सक्रियता देखी  जा रही  है भले ही ज्यादरतर प्रस्तुतियाँ मंच तक नहीं पहुँच पाई हैं लेकिन रिहर्सल तक सक्रियता रंगमंच में जुंबिश तो है। हालांकि किसी भी बदलाव के लिए एक ही कारण जिम्मेदार नहीं होता लेकिन बदलाव दृष्टिगोचर है। नाटकों के मंच तक न पहुँच पाने के कारण भी हैं। उन पर भी बात होनी चाहिए तथा वे नाटक किन कारणो से दलदल में धँसे हैं, हो सके तो वहाँ भी इनपुट दिये जाने चाहिए।
खैर, “कहानी रंगोत्सव” की मार्फत रंग संस्कार थियेटर ने एक और सोपान तय किया है। वह है कि इस बार प्रस्तुतियों में 50 प्रतिशत नाटक अलवर की मिट्टी में ही उगे और खड़े हुए।  कहानियों में दलीप वैरागी (यानि मेरे द्वारा ) रवि बुले की कहानी “हीरो एक लव स्टोरी”, नीलाभ पंडित द्वारा माई द पोसा की कहानी “उन्मादी” तथा प्रदीप कुमार द्वारा स्वलिखित कहानी “उसके इंतज़ार में” ये तीन कहानियाँ अलवर के रंगकर्मियों द्वारा प्रस्तुत की गईं।
दरअसल यह गतिविधि मेरे रंगकर्म में एक मील का पत्थर साबित हुई। अलवर के किसी भी मंच पर मैं लगभग डेढ़ दशक बाद दिखाई दिया हूँ। हीरो एक लव स्टोरी ने आज वही जोश व उमंग अंदर भर दी है, जैसा उस वक्त महसूस किया करता था। यह कहानी 2000 के आस पास इडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी में छपी थी। एक किशोर को केंद्र में रखकर लिखी गई इस कहानी को जब पहली बार पढ़ा तब मैं भी लगभग किशोर था। यह कहानी कहीं उम्र के मूक  प्रश्नो को आवाज देती लगी। तब नाटक का मंच इतनी पकड़ में नहीं था कि कहानी की रंग परिकल्पना की जाए। नाटक का सिलसिला चलता रहा। अंतराल बाद चार-पाँच नाटक निर्देशित करने के बाद भी कहानी तसव्वुर में थी लेकिन हाथ से चली गई। तब विनय मिश्र जी हमें पढ़ाते थे तो उनसे साहित्य वार्षिकी का अंक लिया। लेकिन कॉलेज के बाद दुनियादारी के दलदल में कुछ इस तरह धंस गए कि किशोरावस्था से युवावस्था के रांगडपाने का सफर तय कर लिया पता ही नहीं चला, लेकिन कहानी अभी तक कंधों पर सवार थी। रवि बुले के दोनों कहानी संग्रह भी पढ़ डाले। पिछले साल नरेंद्र को लेकर कहानी की उसके साथ रिहर्सल शुरू की लेकिन कुछ दिन रिहर्सल के बाद बात नहीं बनी। कहानी छूट गई। अभी दो सप्ताह पहले देशराज ने लगभग आदेश भरे स्वर में कहा, “तुम 27 मार्च को एक कहानी का मंचन करने वाले हो।”
मैंने कहा, “भाई कहानी भी बता दो... ”
“रवि बुले की – हीरो : एक लव स्टोरी।”
मुझे लगा कि ईश्वर को यही मंजूर है। कहानी का मंचन होने के बाद मेरे पास दोस्तों के फोन और संदेश आए। वे सब मुझे पुराने अंदाज़ में देख पर खुश लग रहे थे। ये कहानी ही मेरा अटका हुआ प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि ऐसे बहुत से नाटक हैं जो अभी तक मंच तक नहीं पहुंचे है। एक बात तो समझ आई कि रिहर्सलों की भी एक्सपयरी डेट तो होनी चाहिए। अभ्यासों का गुणवत्ता के साथ रिश्ता तो है लेकिन अनंत अभ्यासों के साथ बुलकुल भी नहीं है। नाटक के विचार के कंसीव के बाद प्रस्तुति को एक निश्चित समय तक मंच पर आना ही चाहिए। माँ भी 9 महीने के बाद बच्चे को प्रसव कर देती है। अब चाहे वह किसान बने,डॉक्टर बने या चोर। सबको 9 महीने ही गर्भ में रखती है।
बहरहाल कहानी एक नई ऊर्जा का संचार कर के गई है। कहानी में गीतों व ध्वनियों के प्रयोग  से अविनाश ने इसकी प्रभावोत्पादकता को और बढ़ा दिया। प्रकाश परिकल्पना भी अविनाश की रही। मंच के परे सचिन, राजेश महीवाल व नरेंद्र सेन  का सहयोग उल्लेखनीय रहा। कोशिश है कि किसी न किसी तरह उस ऊर्जा के सहारे मंच पर उपस्थिति को बनाए रखने की कोशिश हो।
दूसरी कहानी हरीशंकर परसाई का प्रसिद्ध व्यंग्य।, “भोलारम का जीव ” थी। इसे अंकुश शर्मा ने निर्देशित किया था। अभिनेता के रूप में कृष सारेश्वर, मदन मोहन, चित्रा सिंह व अंकुश शर्मा थे। वे एक कर्मचारी की रुकी हुई पेंशन को पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते ईश्वर को प्यारे हुए भोलारम के जीव की दास्तान है। इस कहनी मे परसाई जी यमराज के मिथक को  कहानी से  जोड़ देते है। हालांकि अब जैसा माहौल है उसमे मिथकों से काम लेना कम खतरे का काम नहीं। इस कहानी में  नारद है, यमराज है, चित्रगुप्त है।  अंकुश शर्मा इस मिथक में भी कल्पना की छूट लेते हुए यमलोक में भी डिजिटल क्रांति के मॉडल को दर्शा देते हैं वही नारद से वीणा की जगह हारमोनियम पर पॉप म्यूजिक बजवा देते हैं। ये प्रयोग काम करते हैं और दर्शकों को इस लगभग सभी की एक बार पढ़ी कहानी में भी नवीन मनोरंजन परोस देते हैं। सभी कलाकारों का अभिनय बहुत उम्दा था।
तीसरी कहानी माई द पोसा की कहानी “उन्मादी ” थी। यह एक फ्रेंच भाषा की कहानी है जिसके हिन्दी अनुवाद को वरिष्ठ रंगकर्मी नीलाभ पंडित ने प्रस्तुत किया। इस कननी का प्रस्तुतीकरण अन्य कहानियों से जुदा रहा। नीलाभ पंडित जी इस कहानी को दर्शकों को वाचन शैली में सुना रहे थे। निसंदेह वाचन भी कहानी के प्रस्तुतीकरण का एक प्रभावी रूप है। किन्तु जब पूर्व में एक कहानी को दर्शक ड्रामा के रूप में मंच पर चार छ: पात्रों  के रूप में जीवंत देख लें तो उनके मन में किस्सागो से कुछ अलग अपेक्षाएँ बन जाती हैं, शायद । शायद इस वजह से दर्शक वाचन के दौरान अंत तक कहानी के साथ जोड़े नहीं रख पाए। कहानी का विषय भी मनोवैज्ञानिक गाम्भीर्य लिए हुए था। मुझे लगता है कि यह कहानी क्रम में प्रथम कहानी के रूप मे आती तो बेहतर होता। कहानी का चयन भी इसमे एक कारण हो सकता है।
चौथी कहानी फिर से अंकुश शर्मा द्वारा निर्देशित तथा गुलजार द्वारा लिखित कहानी “रावी पार थी।” यह कहानी 1947 के विभाजन में निर्वासन का दंश झेले एक परिवार की त्रासदी है। कहानी का पहला संवाद है – “पता नहीं दर्शन सिंह क्यों पागल नहीं हो गया ? बाप घर पे मर गया। माँ उस बचे-खुचे गुरद्वारे में गुम हो गई। शाहनी ने एक साथ दो जुड़वां बेटे जन दिये। उसे समझ नहीं आता था कि हँसे या रोए! इस हाथ ले उस हाथ दे का सौदा किया था किस्मत ने...
सामन्यात: वेदना और संत्रास के जिस बिन्दु पर चढ़ कर कहानियाँ समाप्त होती हैं। ये कहानी दर्शन सिंह की इस अजीब स्थिति से शुरू होती है। उपरोक्त  संवाद बोलने में जितना जीभ को सर्द और सुन्न कर देने वाला है इसे अभिनेता का अपने शरीर पे धारण करना शोलों को धारण करने जैसा है। अंकुश शर्मा जैसे ही किस्सागो की जगह बैठ कर इस संवाद को उच्चारित करते हैं। विंग से बाहर दर्शन सिंह के रूप में कृष सारेश्वर की पथराई हुई चाल दिखाई देती है। चाल ऐसी जिसे देख कर प्रतीत होता है कि कदम कहीं नहीं पहुँचना चाहते लेकिन चलना चाहते  है। उसके साथ अनुगामी चित्रा सिंह है शाहनी के रूप में। मंच के बीच आकार बैठ जाते हैं। कहानी का यह पहला वाक्य अब कृष सारेश्वर के सारे वजूद में नुमाया हो उठता है उसकी यह अजीब सी कैफियत आँखों के फट कर बाहर आ जाने को झाँकती है। कहानी के पहले वाक्य पर दर्शन सिंह के अभिनय ने दर्शकों के दिमाग में इस तरह से पैठ बनाई दर्शक अपलक पूरी कहानी को देखते चले गए। मदन मोहन कहानी मे संगीत के संपुट लगा रहे थे। अंकुश किस्सागो के अंदाज में बोल कर घटनाओं को बोल कर बता रहे थे। और वह जो सब बोला नहीं जा सकता उसे कृष सारेश्वर और चित्रा सिंह  बकायदा अपनी मूक छवि से बता रहे थे।
Image may contain: 1 person, standingपाँचवी कहानी “उसके इंतज़ार में” प्रदीप कुमार लिखित व अभिनीत थी। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि यह कहानी उनके पूर्व में किए गए नाटक “उसके इंतज़ार में ” से बुनियादी रूप से अलग है। उसके इंतज़ार में एक युवक की कहानी है। जो प्रेम करता है, प्रेमिका से, देश से, हुनर से, कला से, भाषा से व शौक से। बाधाएँ भी है और संघर्ष भी है। उसे इंतज़ार  है समाज बदलने का, वह सब कुछ आने का। प्रदीप कुमार की लिखी कहानी में कथा क्षीण है लेकिन सूत्र बहुत हैं कथा से लोगों को जोड़ने के। कहनी में घटनाओं का अभाव है और विमर्श ज्यादा हैं। प्रदीप कुमार एक मंझे हुए अभिनेता हैं। वे अपने जबर्दस्त अभिनय से कहानी को सफलता पूर्वक निकाल ले गए। अगर किसी प्रस्तुति में दर्शक सबसे ज्यादा जुड़े हुए दिखाई दिये वो इस कहानी में। यहाँ प्रदीप कुमार का मंच कवि भी उनके साथ  आ खड़ा होता है। वे अपनी कहानी की एक-एक सींवन मंच पर खड़े होकर खोलते जाते हैं और धागे निकाल निकाल-निकाल कर दर्शकों में थमाते जाते हैं। वे कहानी के साथ दर्शकों पर एक अदृश्य जाल सा बुनते जाते हैं। वह जाल दर्शकों को गुदगुदता प्रतीत होता है किन्तु प्रदीप गहरी चोट भी करते जाते है। चाहे वह डिजिटल क्रांति के नाम पर जियो के सहारे जियो जीवन  हो या राजनैतिक परिदृश्य हो, सुविधाओं के नाम पर बुनियादी चीजों को बाजार से लगभग एक साजिश के तहत गायब करके गैर जरूरी चीजों के थोपने की बात हो। शिक्षा व्यवस्था के दोहरेपन पे भी वे गम्भीरे चोट करते हैं। इस कहानी में जो सबसे महत्वपूर्ण बात लगी वह है दर्शकों की सक्रिय सी दिखने वाली भागीदारी। परंपरागत किस्सागो जिस तरह हुंकारा भरवाए बिना आगे नहीं बढ़ता, वैसे ही प्रदीप कुमार दर्शक के चेहरे का रेस्पोंस जाँचे बिना आगे नहीं बढ़ते। यह एक अद्भुत कौशल है।   
छठी व अंतिम कहानी थी कारेल चापेक की कहानी “टिकटों का संग्रह”। कहानी का अनुवाद निर्मल वर्मा का किया हुआ है। कहानी का  अभिनय दिनकर शर्मा ने किया। दिनकर शर्मा झारखंड में रहते हैं व एकल प्रस्तुतियों के लिए सिद्धस्त अभिनेता हैं। यह कहानी एक बच्चे की कहानी है जिसे टिकटों का संग्रह करने का शौक है लेकिन यह शौक उसके पिता को बिलकुल पसंद नहीं है। एक दिन बच्चे को पता चलता है कि उसका संग्रह किया हुआ खजाना चोरी हो चुका है। बाहर से यह एक छोटी सी चोरी है लेकिन उस बच्चे के भीतर से बहुत कुछ सिरे से गायब कर जाती है – उसका व्यक्तित्व। वह अपने दोस्त से नफरत करने लगता है। अपनी पत्नी से जीवन भर प्यार नहीं कर पता है। उसका पूरा जीवन कड़वाहट का इतिहास बन कर रह जाता है। आखिर में जब उसे पता चलता है कि उसके पिता ने .... तो वह फिर से टिकटों का संग्रह शुरू कर देता है... इस कहानी को दिनकर शर्मा बहुत सहजता से धीमी आवाज में शुरू करते हैं। धीरे धीरी अपने सहज सधे  हुए अभिनय से वे दर्शकों को कहानी की दुनिया की सैर पर ले जाने में कामयाब हो जाते हैं। उन्होने बहुत ही सात्विक अभिनय किया ऐसे बहुत से स्थान कहानी में आते हैं जहां वे अपने सात्विक अश्रुधारा में दर्शकों को भी नम व सराबोर कर जाते हैं। कहानी के अंतर्निहित संदेश कि छोटी से छोटी घटनाएँ बच्चों की ज़िंदगी बदल देती है। अत: उन्हे दुनिया को अपनी निगाहों से देखने समझने दिया जाए। दूसरा संदेश या कि जिंदगी के किसी भी मोड पर सपनों को पंख दिये जा सकते हैं।  संदेश दर्शकों तक सटीकता से पहुंचे।  
इस कार्यक्रम का दूसरा आकर्षण रहा रंगकर्मियों का सम्मान समारोह। इसके तहत रंगकर्म में उल्लेखनीय योगदान के लिए रंगकर्मियों का शॉल व सम्मान पत्र भेंट कर सम्मान किया, जिसमे पुराने व नए सभी प्रकार के रंगकर्मी शामिल थे। एक तरफ जहां यह  रंग संस्कार थियेटर ग्रुप  की अनूठी पहल है वही यह पहल देशराज को कुछ दिन परेशान भी करेगी। क्योंकि इतने बड़े जिले में कुछ नामों का छूटना अवश्यंभावी है। उन सवालों का सामना देशराज को शायद करना पड़े। खैर यह पहल अच्छी है। इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हर साल रंगकर्म में उत्कृष्ट कार्य के लिए एक दो रंगकर्मियों का सम्मान होना चाहिए ताकि लोगों का उत्कृष्टता के लिए आग्रह भी हो। उसकी चयन प्रक्रिया भी निर्धारित होनी चाहिए।  
इस कार्यक्रम के सूत्रधार देशराज के लिए जितना कहा जाए कम है। बस इतना ही कहना है कि उनका जज्बा और होसला बना रहे। इसी शिद्दत के साथ वह रंगकर्म में सलग्न रहे। अपनी विनम्रता को बनाए रखे। क्योंकि सफलता सबसे पहले विनम्रता को चाटती है। विनम्रता के साथ ही व्यक्ति स्थायी रूप से सफलता के शिखर पर बैठ सकता है। इस कार्यक्रम में नेपथ्य से चार लोगों का योगदान साफ दृष्टिगोचर हो रहा था – अमित गोयल, नीलाभ ठाकुर, संदीप शर्मा, अविनाश और सचिन।

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दलीप वैरागी 
09928986983 
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